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सिलसिलेवार हार और डूबते क्षत्रप

अजित सिंह राठी की कलम से 

पिछले चार सालों में भारतीय राजनीति की जो तस्वीर उभरी है उससे कई नए मानदंड स्थापित हुए हैं। 2014 से भी बड़े बहुमत से 2019 में पुन: देश की सत्ता संभाल लेना मोदी की लोकप्रियता का पुख्ता प्रमाण है लेकिन 2017 से पंजाब विधानसभा चुनाव से शुरू होकर अभी अभी झारखण्ड विधानसभा चुनाव तक के हार के बेहद पीड़ादायक राजनीतिक सफ़र में काफी कुछ हाथ से निकल जाना राज्यों में नेतृत्व का बड़ा फेलियर है। अवाम का ऐसा मिज़ाज़ बदला कि राज्यों में सरकार चुनते वक़्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को भी नकार दिया। कई बड़े राज्यों की हार यह बताती है कि पब्लिक मोदी से तो संतुष्ट है लेकिन भाजपा के क्षेत्रीय क्षत्रपों से ऊब चुकी है। केंद्र में भले ही मोदी के सामने कांग्रेस नेतृत्व खड़ा न हो पा रहा हो लेकिन प्रांतों में कांग्रेस के जो क्षेत्रीय सिपहसालार है वो भाजपा के क्षत्रपों पर भारी पड़ रहे हैं। भाजपा जिन राज्यों में विधानसभा हारती आ रही है वहां से एक कॉमन फ़ीडबैक यह है कि मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों और विधायकों के बजाय अफसरों को ज़्यादा तवज्जो देते रहे और उन्हीं पर भरोसा करते रहे। संगठन केवल नाम भर का रह गया था और मंत्री/विधायकों की सरकारी सिस्टम में कोई सुनवाई नहीं होने के कारण कार्यकर्त्ता दूर होते गए। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और झारखण्ड में रघुबर दास के खिलाफ इन्हीं बातों को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी थी। ईमानदार सरकार होने का जो ढोल पीटा जा रहा था, उसे पार्टी के ही विधायक अपने समर्थकों के बीच झुठला दे रहे थे। और, उस कथित ईमानदारी को जनता ने भी चुनाव के वक़्त सिरे से ख़ारिज कर दिया।

पंजाब विधानसभा चुनाव मार्च 2017यहाँ चुनाव हुए तो भाजपा गठबंधन की सरकार को धूल चटाते हुए कांग्रेस ने सत्ता हथिया ली। भाजपा को 117 में से मात्र तीन और सहयोगी दल SAD 15 सीटों पर सिमट गया। भाजपा और सहयोगी दल से ज्यादा सीटें आम आदमी पार्टी ने जीत ली तो भाजपा के लिए और भी चिंता बढ़ गयी। पंजाब विधानसभा में कांग्रेस ने 77, आप ने 20, शिरोमणि अकाली दल ने 15 और भाजपा ने 03 सीटें जीती। यहाँ पर भाजपा यह भांपने में नाकाम हो गयी कि सुखबीर सिंह बादल से लोग बेहद नाराज है।

राजस्थान विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2018इस बड़े राजनितिक महत्व वाले प्रदेश में भाजपा की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से लोग इतने नाराज हुए कि विधानसभा चुनाव में “मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं”  जैसा नारा दे दिया। उधर भाजपा के विद्रोही हनुमान बेनीवाल ने अलग पार्टी बनाकर पार्टी को दो दर्जन सीटों पर चुनाव हवा दिया। भाजपा का यहाँ चुनाव में 89 विधानसभा सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा नेतृत्व पर कई सालों से वसुंधरा को हटाने का दबाव बना हुआ था लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलता देख पब्लिक ने खुद फैसला करके भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। यहाँ पर कुल 199 (एक सीट पर चुनाव नहीं हुआ था) में से कांग्रेस ने 99, भाजपा ने 73 सीटें जीती और राजस्थान कांग्रेस की झोली में जा गिरा।

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2018 भाजपा मध्य प्रदेश में भी पिछड़ रही थी, लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान पर पूरा भरोसा करके गलती कर दी। यदि शिवराज के बेटियों का मामा बनकर और महिलाओ को राखी बांधकर ही सत्ता मिलती तो राजनीति बहुत आसान हो गयी होती। जनता ने भाजपा को नकार कर यहाँ भी कांग्रेस को सत्ता सौंपी। भाजपा ने इस राज्य में 56 सीटों का नुकसान उठाकर 109 सीटें जीतीं। जबकि कांग्रेस 56 सीटें बढाकर 114 सीटें पाईं। इस तरह से यह बड़ा प्रदेश भी भाजपा के हाथ से निकल गया।

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2018 इस राज्य में एक दशक से ज्यादा समय से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रमन सिंह को सत्ता से बाहर का ऐसा रास्ता दिखाया कि भाजपा के पास नेता प्रतिपक्ष का दावा करने लायक भी विधायक नहीं बचे। 34 सीटों के नुकसान पर भाजपा मात्र 15 सीटों पर सिमट गयी और कांग्रेस 68 सीटें ले उडी। पब्लिक की नाराजगी को भाजपा यहाँ भी नहीं भांप सकी और यह राज्य भी हाथ से निकल गया।

हरियाणा विधानसभा चुनाव अक्टूबर 2019 हरियाणा में गैर जाट का कार्ड खेलने का खामियाजा भुगतना पड़ा। हरियाणा में जिन जाटों को दरकिनार कर भाजपा राजनीति कर रही थी उन्हीं जाटों (दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी) की बैशाखी के सहारे बमुश्किल इज्जत बचाकर सरकार बना सकी। अबकी बार 75 पार का नारा नहीं चला और 7 सीट खो कर भाजपा 40 पर सिमट गयी। वहीँ पिछले चुनाव में 15 पर अटकी कांग्रेस इस चुनाव में 31 का आंकड़ा छू गयी और वह भी केवल भूपेंद्र सिंह हुड्डा दम पर। राजनीतिक विश्लेषकों ने यहाँ तक कहा कि यदि हुड्डा को चुनाव की कमान दो तीन महीने पहले मिल गयी होती तो सियासी बजी पलट गयी होती।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव अक्टूबर 2019 इस वाणिज्यिक राज्य महाराष्ट्र में भी भाजपा ने गैर मराठा कार्ड खेला और उसकी सहयोगी शिव सेना शुरू से ही कहती रही कि इस बार शिब सैनिक मराठा मानुस ही मुख्यमंत्री होगा। हुआ भी वही। भाजपा को यहाँ शिवसेना की जिद और शरद पवार के रजनीतिक तजुर्बे ने करारी मात दी। यहाँ भी आम भाजपाई के देवेंद्र फडणवीस को पसंद नहीं करने के बावजूद भाजपा ने चुनाव में उन्हें ही मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। नतीजा सभी के सामने है, आज महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन की सरकार चल रही है और भाजपा किनारे खड़ी है। इस चुनाव में भाजपा को 106 सीट मिली जबकि पिछले चुनाव में 122 सीटें थी।

झारखण्ड विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2019 हरियाणा की तर्ज पर भाजपा ने यहाँ भी बड़े समुदाय को दरकिनार कर ओबीसी नेता रघुबर दास को मुख्यमंत्री बनाया था। जिस राज्य में आधे से अधिक आबादी आदिवासियों की हो वह पर उनके साथ अन्याय करके दूसरे समुदाय को आगे बढ़ाने की प्रतिक्रिया में भाजपा का विजय रथ थम गया और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन ने 49 सीटें जीत ली। जिस गैर आदिवासी चेहरे रघुबर दास पर दांव लगाया वही चुनाव हार गया। ईमानदार नेता सरयू राय भाजपा को बताते रहे कि सरकार ठीक नहीं चल रही है, लेकिन उनकी एक नहीं सुनी। सरयू भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे, छोड़कर बागी हुए और मुख्यमंत्री के सामने चुनाव लड़कर जीत गए। भाजपा यहाँ 25 सीटों पर सिमट गयी।

 

 

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