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उत्तराखंड में यहां मिल रहे प्रचीन सभ्यता के अवशेष, खुदाई में मिल रहीं मूर्तियां

उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 46 किमी दूर धरासू-यमुनोत्री हाईवे के पास नामनगर (रामनगर) में थोड़ी बहुत खुदाई करने पर प्राचीन मूर्तियां मिल रही हैं। दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार स्थानीय ग्रामीणों ने नामनगर के तीन वर्ग किमी क्षेत्र में पुरातत्व विभाग से सर्वे कराने की मांग की है, जिससे यहां दफ्न सभ्यता का पता लग सके। हालांकि, अभी तक प्रशासन और पुरातत्व विभाग की टीम निरीक्षण के लिए नहीं पहुंची है। खबर के मुताबिक उत्तरकाशी जिले के डुंडा तहसील क्षेत्र में पयांसारी गांव के पास नामनगर में पटारा गांव के ग्रामीणों की छानियां (पीढ़ियों पुराने घर) बनी हुई हैं। कई साल पहले लगातार घटी अप्रिय घटनाओं के कारण ग्रामीणों ने इन छानियों को छोड़ दिया था। साथ यहां की कुछ जमीन राजकीय महाविद्यालय ब्रह्मखाल को दान कर दी थी। इसी भूमि पर महाविद्यालय के भवन का निर्माण होना है। अब यहां खेतों में हल चलाने और निर्माण के लिए खोदाई करने पर तरह-तरह की मूर्तियां और कलाकृतियां निकल रही हैं।

बौद्ध राजा का राजमहल था कभी
बौध राजा सनातनी देवी-देवताओं का अनादर करता था। नतीजा एक समय भारी भूस्खलन हुआ और राजा का पूरा गढ़ जमींदोज हो गया। भूस्खलन के प्रमाण अभी भी दिखते हैं। पयांसारी के ही 62-वर्षीय त्रेपन सिंह कुमाईं कहते हैं कि इसी वर्ष जून में जब मनरेगा के तहत पेयजल स्नोत पर कार्य चल रहा था तो खोदाई में किसी मंदिर या महल के स्तंभ मिले। साथ ही मूर्तियां भी नजर आईं। कुछ वर्ष पहले जब पटारा गांव निवासी हुकुम सिंह अपनी छानी बना रहे थे, तब भी शेषनाग व शिवलिंग की मूर्तियां मिली थीं।
कलीराम डोभाल को भी खेतों में हल चलाते हुए कई मूर्तियां मिलीं। सरतली गांव के 80 वर्षीय विक्रम सिंह पंवार कहते हैं कि राजशाही के दौर में वन दारोगा रहे सत्य शरण डोभाल को नामनगर में खेती-किसानी के लिए पट्टा मिला था। जब उन्होंने मकान निर्माण के लिए खोदाई की तो कई प्राचीन मूर्तियां निकलीं। फिर उन्होंने वहां से दूर मकान बनाया। बताया कि निर्माण और हल चलाने के दौरान निकली मूर्तियों को ग्रामीणों ने काली मंदिर परिसर में एकत्र किया हुआ है। डुंडा तहसील के पयांसारी गांव के नामनगर में सदियों पहले हुए भूस्खलन का इस तरह से मलबा बिखरा पड़ा है, जो ज्वालामुखी के लावे के तरह दिखता है

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