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“स्वदेशी ही आत्मनिर्भर भारत का एकमात्र विकल्प”

कोई भी देश बिना स्वदेशीपन के आत्मनिर्भर नहीं बन सकता! जो जितना स्वदेशी है, वह उतना ही आत्मनिर्भर! अतः आज के वैश्विक परिदृश्य में आत्मनिर्भर होना देश की परिपक्वता को दर्शाता है।
आज के दौर में वही देश विकसित है, जो अपनी जरूरतों की चीज़े स्वयं निर्मित करता है। अतः आत्मनिर्भरता को स्वदेशी से जोड़कर देखने से इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
भारत भी स्वदेशी के मार्ग पर अग्रसर है जिससे भविष्य में हम आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को साकार रूप प्रदान कर सकें। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश में निर्मित वस्तुएं खरीदने एवं रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल करने की आवश्यकता है। अगर हम ऐसा करने में सफल होते हैं, तो भारत में निर्मित वस्तुओं की डिमांड बढ़ेगी, जिससे आत्मनिर्भर भारत का मार्ग प्रशस्त होगा।
विश्व में जनसंख्या के दूसरे पायदान पर होने के कारण आज भारत पूरी दुनिया में बड़े बाजार के रूप में जाना जाता है। जिससे प्रत्येक देश की नजर सिर्फ यहां व्यापार करने पर रहती है, जिसके कारण हमारे देश का पैसा विदेशी कंपनियों के हाथों में चला जाता है, जिससे यह देश तो और अमीर बन जाते हैं, किंतु हमारा देश और गरीब होता चला जाता है।

यदि हम स्वदेशी वस्तुओं को खरीदते हैं तो हमारे देश की पूंजी हमारे ही लोगों के पास रहती है। हमारे ही लोगों को रोजगार मिलता है। अतएव आज के परिदृश्य में आत्मनिर्भर होने के लिए स्वदेशी को अपनाना अतिआवश्यक है। जिससे आत्मनिर्भर भारत अभियान को साकार रूप मिल सके।

वर्तमान हालात से उभरने के लिए स्वदेशी की भावना आधुनिक भारत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन करेगी।वर्तमान परिदृश्य में स्वदेशी की भावना का अर्थ है जहां तक संभव हो, हम अपने देश में निर्मित वस्तुओं का ही उपभोग करें। तभी स्वावलंबी भारत का निर्माण हो सकेगा।

स्वावलंबन की प्रक्रिया को साकार रुप प्रदान करने के लिए हमें राष्ट्रीय और ग्रामीण स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्तर पर रक्षा, स्वास्थ्य, मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी वस्तुओं में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना बहुत आवश्यक हो गया है, तुम तो याद ही सत्य है कि कोई भी देश सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। अतः जिन चीजों की हमारे यहां कमी है, उनका उपभोग हम सीमित मात्रा में करें। हम बुनियादी जरूरतों के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भर न हो। यही आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य है।

गांधी जी के कथनानुसार “भारत गांवों में बसता है।” यदि हमारे गांव स्वावलंबी हो जाए तो निश्चित तौर पर भारत स्वावलंबी हो जाएगा। ग्रामीण स्तर पर जहां तक संभव हो सके, हम बुनियादी जरूरतों की पूर्ति स्थानीय उत्पादों से ही करें, जिससे स्वदेशी का सकारात्मक संदेश दूर-दूर तक पहुंच सकेगा, परंपरागत रोजगार का जीर्णोद्धार हो सकेगा। शिक्षित युवाओं को शिक्षा, कौशल और रुचि के अनुकूल स्वरोजगार मिल सकेगा। नई प्रतिभाओं को पर्याप्त अवसर मिलने से ग्रामीण स्तर ऊपर उठ सकेगा।

प्राचीन काल से ही भारत अपनी स्वाबलंबी प्रकृति के लिए जाना जाता था। भारत में स्वदेशी का विचार कोई नया नहीं है, किंतु स्वदेशी की अवधारणा को हम 1905 के ‘बंग- भंग’ आंदोलन से देखते हैं, जिसने स्वदेशी के विचार को बल दिया। यह आंदोलन 1911 तक चला। अभी तक महात्मा गांधी का भारतीय राजनीति में पदार्पण नहीं हुआ था। उस समय बाल गंगाधर तिलक, अरविंदो घोष, वीर सावरकर, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल स्वदेशी आंदोलन के मुख्य प्रवर्तक की भूमिका में थे।

बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि “हमारा उद्देश्य आत्मनिर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं! ” उन्होंने स्वदेशी संसाधनों का प्रयोग व विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे विचारों पर बल दिया। आगे चलकर महात्मा गांधी ने तिलक के विचारों को ही आत्मसात कर अपने सत्याग्रह आंदोलन को साकार रूप प्रदान किया।साथ ही साथ स्वदेशी को स्वराज्य की आत्मा भी कहा।

स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर ने कहा था कि “भारत को विश्व के लिए मार्गदर्शक बनना है और यह स्वदेशी की शक्ति से ही संभव हो सकता है। विकसित आत्मनिर्भर भारत ही विश्व का मार्गदर्शन कर सकेगा। भारत ही है जो विश्व को दिशा दिखा सकता है।” सावरकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वदेशी के समर्थन में 7 अक्टूबर 1950 को पुणे में विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी। सावरकर का मानना था कि भारत को रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर होना चाहिए। ताकि हम बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित हो पाए। वीर सावरकर ने विदेशी कपड़ों को जलाकर जो स्वदेशी की अलख जगाई थी, उसकी प्रासंगिकता आज भी है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कोरोना काल के संकट में उनके आत्मनिर्भर भारत के स्वदेशी विचार का मंत्र सबको दिया।

भारत के स्वतंत्रता सेनानियों में बिपिन चंद्र पाल स्वदेशी, स्वराज और बहिष्कार के सबसे प्रबल समर्थक थे। उन्होंने 1906 से 1909 के मध्य दिए ‘द गॉस्पेल ऑफ स्वराज’ और ‘स्वराज इट्स वेस एंड मीन्स ‘ में स्वराज और स्वदेशी जैसे शब्दों का अर्थ भली-भांति समझाया था। पाल ने स्वराज्य को स्व-कराधान, वित्तीय नियंत्रण का अधिकार और विदेशी आय पर सुरक्षात्मक एवं निषेधात्मक शुल्क लगाने का अधिकार प्राप्त करना माना था। इसके साथ ही इस लक्ष्य प्राप्ति का साधन कानून के भीतर निष्क्रिय प्रतिरोध और आत्मनिर्भरता को माना था।

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी की बात की है उसे बिपिन चंद्र पाल के दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर विपिन चंद्र पाल का स्पष्ट मत था कि “हम बाजार में सस्ती वस्तुओं का आयात प्रतिबंधित नहीं कर सकते, न ही सरकार को ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। किंतु हम दृढ़ संकल्प से विदेशी वस्तुओं को खरीदने से इंकार अवश्य कर सकते हैं।” इस प्रकार विदेशी सामान खरीदने से इंकार कर बहिष्कार आंदोलन द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से अपने स्वयं के उद्योगों की रक्षा की जा सकती है।

विश्व के अनेक देशों ने महात्मा गांधी के स्वदेशी विचार को अपनाकर ही अपने राष्ट्र का कायाकल्प किया है द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जापान जब पूरी तरह नेस्तनाबूद हो गया तो स्वदेशी का मंत्र अपनाकर मृतप्राय राष्ट्रों में नवीन चेतना का संचार हुआ और अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर वह विकसित देशों की कतार में आकर खड़ा हो गया इसी प्रकार बीसवीं शताब्दी में सोवियत संघ में राजशाही के अंत के उपरांत स्टालिन के नेतृत्व में स्वदेशी नीति को प्राथमिकता देकर ही अपना बुनियादी ढांचा मजबूत किया गया अगर चीन पर गौर करें तो 1949 में भारत के अपेक्षाकृत लगभग हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था वह भारी कर से लदा हुआ था परंतु स्वदेशी की नीति को बदल कर ही उसने विकास की नई ऊंचाइयों को छुआ और आज विश्व व्यापार में चीन की हिस्सेदारी किसी से छिपी नहीं है। निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है यदि हम कुछ मूलभूत चुनौतियों को ध्यान में रखकर स्वदेशी की विचारधारा पर कार्य करें तो भारत आत्मनिर्भर होकर वैश्विक पटल पर राजनैतिक, आर्थिक एक संस्कृतिक महाशक्ति के रूप में स्थापित हो सकता है।

“चलो, इस तरफ़ अपना चरख़ा चला दो
मनों सूत की ढेरियां तुम लगा दो
बुनो इतने कपड़े, मिलों को छका दो
जमा दो, स्वदेशी का सिक्का जमा दो”

– विवेक मिश्र
शोधार्थी, राजनीति विज्ञान
अवध विश्वविद्यालय
अयोध्या

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