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ऐतिहासिक विवाद का ऐतिहासिक फैसला !

सत्यजीत पंवार

आखिरकार देश के सबसे विवादित, सबसे संवेदनशील और सबसे जटिल मसले का समाधान हो गया। बीते नौ नवंबर को देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने खचाखच भरी अदालत में जैसे ही अयोध्या राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद मालिकाना विवाद पर फैसला सुनाया, यह तारीख इतिहास की किताब में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। लगातार चालीस दिन तक सुनवाई करने के बाद पांच जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया और सत्तर वर्षों से चली आ रही कानूनी लड़ाई पर पूर्णविराम लग गया। 17 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। तब से हर कोई फैससे की घड़ी का इंतजार कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने हर पक्ष की सभी दलीलों को सुनने, साक्ष्यों की पड़ताल करने और हर तरह से संतुष्ठ होने के बाद इस मामले में फैसला सुनाया है। कुल 1000 से ज्यादा (1045) पन्नों के लंबे फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के एक-एक बिंदु को स्पष्ठ किया है। सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में मंदिर और मस्जिद दोनों के निर्माण की राह खोल दी है। अपने फैसले में जहां सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल का मालिकाना हक रामलला के नाम कर हिंदुओं के बहुप्रतीक्षित राम मंदिर निर्माण का रास्ता तैयार कर दिया है, वहीं अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ जमीन देने का निर्देश देकर मुस्लिम धर्मावलंबियों की आस्था का भी पूरा सम्मान किया है। सुप्रीम कोर्ट ने यहां विवादित स्थल पर रामलला के मालिकाना हक की बात कही, वहीं साफ शब्दों में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने को भी गैरकानूनी करार दिया। बाबरी विध्वंस की घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट की इस  टिप्पणी को बेहद गंभीर माना जा रहा है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर देशभर से आ रही प्रतिक्रियाओं का सार यही है कि इस फैसले में किसी भी पक्ष की हार नहीं हुई है। तमाम राजनीतिक दलों ने जिस तरह इस फैसले के आने के बाद जनता से सद्भाव बनाए रखने की अपील की उसे भी राजनीतिक परिपक्वता की दृष्टि से सराहनीय कहा जाएगा। आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) या कुछ अन्य छिट-पुट राजनीतिक दलों तथा संगठनों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर राजनीतिक दलों ने इस फैसले के प्रति पूरा सम्मान प्रकट किया। सत्ताधारी भाजपा और उसके सहयोगी राजनीतिक दलों ने तो दिल खोल कर इस फैसले का स्वागत किया ही, साथ ही कांग्रेस, बसपा, सपा, एनसीपी, आम आदमी पार्टी समेत कई अन्य दलों ने भी फैसले का पूरी तरह स्वागत किया। फैसले को लेकर सबसे ज्यादा मुखर एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैशी रहे जिन्होंने यहां तक कह दिया कि मुस्लिमों को पांच एकड़ जमीन की खैरात नहीं चाहिए। बहरहाल इस फैसले के आने के बाद सबसे सुखद यह रहा कि देश में किसी भी तरह की तनाव की स्थिति पैदा नहीं हुई। देश के किसी भी कोने से किसी भी तरह की अप्रिय सूचना नहीं सुनाई दी। सांप्रयादिक तनाव की आशंका को देखते हुए देश के तमाम हिस्सों में शासन प्रशासन ने पुख्ता इंतजाम किए थे, मगर लोगों ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया उसने पुलिसिया हस्तक्षेप की नौबत ही नहीं आने दी।
किसी भी समाज की असल परीक्षा संकट के समय होती है। संकट के समय ही पता चलता है कि लोगों के मन में भाईचारे का प्राणतत्व बचा है या नहीं। इस लिहाज से देखें तो अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह देश के आम लोगों ने शांति और सौहार्द का परिचय दिया उससे सिद्ध होता है कि भारत की बहुरंगी संस्कृति बेहद बेहद समृद्ध है। इसी तरह देश के कानून के प्रति पूर्ण सम्मान दिखा कर भारत वासियों ने लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी होने का भी शानदार उदाहरण दुनिया के सामने रखा।
बहरहाल अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर बोर्ड का गठन करने और मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही उपयुक्त जगह पर तीन एकड़ भूमि का इंतजाम करने को कहा है। सरकार ने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है। ऐसे में अब सभी की एक ही उम्मीद है कि वर्षों से चली आ रही कटुता को भूल कर दोनों धर्मों के लोग आगे बढ़ेंगे और राष्ट्र निर्माण में अपनी अहम भूमिका अदा करेंगे।
अयोध्या पर आए इस ऐतिहासिक फैसले के तमाम पहलू हैं जो हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गए हैं। इस मामले को देश की आजादी के बाद सबसे ज्यादा वक्त तक चलने वाले मुकदमे के रूप में भी याद रखा जाएगा तो देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में लगातार सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाले दूसरे मुकदमे के रूप में भी याद रखा जाएगा। इससे पहले केशवानंद भारती बनाम भारत सरकार के प्रसिद्ध मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही सबसे लंबी, दिनों तक चली थी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह प्राचीन ग्रंथों, शोध पत्रों, रिपोर्टों, यात्रा वृतांतों और अन्य दस्तावेजों का हवाला दिया है, वह बेहद रोचक है। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वाल्मिक रामायण से लेकर आईन-ए-अकबरी और से लेकर इंडियन गटेटियर तक का हवाला दिया है। कुल मिलाकर कहना गलत नहीं होगा कि जिस समले सो सियासी हुक्मरान इतने वर्षों से नहीं सुलझा पाए उसका समाधान देश की सुप्रीम कोर्ट ने चालीस दिन की सुनवाई के बाद बेहद शानदार तरीके से निकाल दिया। इस फैसले को सुनाने वाली पीठ के पांचों न्यायाधीश, पक्षकार, पक्षकारों के अधिवक्तागण, गवाह तथा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस मामले से जुड़े सभी लोग एक ऐसा जीवंत दस्तावेज बन गए हैं जिसकी अमिट छाप इतिहास की किताब हमेशा बनी रहेगी।

अब आगे बढने का वक्त

1947 से लेकर 2019 तक आम जन मानस की सोच में आए व्यापक परिवर्तनों का सुखद पहलू यह है कि अब देश की जनता हर मुद्दे को पीछे छोड़ कर आगे बढने लगी है जो उसकी तरक्की की राह में रोड़ा बनते हैं। सांप्रदायिकता, धार्मिक उन्माद और तुष्टीकरण जैसे मसलों पर जनता को भरमाना भी अब बीते कल की बात हो चली है। चाहे आम जन मानस हो या खास तबके के लोग हर कोई इस बात को पूरी तरह से समझ चुके हैं कि सत्ता के लिए सियासतदानों ने उन्हें इतने वर्षों तक मंदिर-मस्जिद के मुद्दे से भिड़ाया रहा। मंदिर-मस्जिद की राजनीति करके कई नेता तो तरक्की की सीढियां चढ़ते रहे और दूसरी तरफ आम जनता के हिस्से केवल और केवल छलावा ही आया। इस छलावे को जनता समझ चुकी है इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद कहीं भी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई।

फैसले की प्रमुख बातें

    1. कोर्ट ने कहा कि यह फैसला पांच जजों की सर्व सहमति से हुआ है।
    2. कोर्ट ने रामलला को कानूनी व्यक्ति मानते हुए विवादित जमीन का मालिकाना हक देने का फैसला सुनाया।
    3. कोर्ट ने कहा कि रामलला को 77 एकड़ जमीन मिलेगी और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही उचित स्थान पर पांच एकड़ जमीन दी जाएगी।
    4. कोर्ट ने कहा कि कहा कि हमारे सामने जो सबूत रखे गए वे बताते हैं कि विवादित जमीन हिंदुओं की है।
    5. कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) की जांच रिपोर्ट को अहम सबूत मानते हुए कहा कि रिपोर्ट के मुताबिक खाली जमीन पर मस्जिद नहीं बनाई गई थी।
    6. कोर्ट ने कहा कि विश्वास एक व्यक्तिगत एक मामला है। अदालत में मुस्लिम गवाहों ने भी स्वीकार किया कि विवादित स्थल पर दोनों पक्ष पूजा करते थे।
    7. कोर्च ने कहा कि सन 1856-57 से पहले हिंदुओं पर विवादित परिसर के भीतर आने-जाने की कोई रोक नहीं थी और मुस्लिमों को बाहरी आहाते का अधिकार नहीं था। सुन्नी वक्फ बोर्ड एकल अधिकार का सबूत नहीं दे पाया.
    8. कोर्ट ने कहा कि सूट-5 इतिहास के आधार पर है जिसमें यात्रा का विवरण है। मस्जिद कब बनी और किसने बनाई साफ नहीं है।
    9. कोर्ट ने सरकार को मंदिर के निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया।
    10. कोर्ट ने कहा कि सन 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराया जाना गैर-कानूनी था।
  • निर्णय पर किसने क्या कहा  

    ‘देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या पर अपना फैसला सुना दिया है। इस फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।  रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है। देशवासियों से मेरी अपील है कि शांति, सद्भाव और एकता बनाए रखें।’ नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

  •  ‘श्रीराम जन्मभूमि पर सर्वसम्मति से आये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का मैं स्वागत करता हूँ। मैं सभी समुदायों और धर्म के लोगों से अपील करता हूँ कि हम इस निर्णय को सहजता से स्वीकारते हुए शांति और सौहार्द से परिपूर्ण ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के अपने संकल्प के प्रति कटिबद्ध रहें।’  अमित शाह, गृहमंत्री
  •  ‘सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मुद्दे पर अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट के इस फैसले का सम्मान करते हुए हम सब को आपसी सद्भावबनाए रखना है। ये वक्त हम सभी भारतीयों के बीच बन्धुत्व,विश्वास और प्रेम का है।’ राहुल गांधी, कांग्रेस नेता
  •   ‘माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत है, देश की एकता व सद्भाव बनाए रखने में सभी सहयोग करें, उत्तर प्रदेश में शांति, सुरक्षा और सद्भाव का वातावरण बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है।’ योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
  •     ‘सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद SC की बेंच के पाँचों जजों ने एकमत से आज अपना निर्णय दिया। हम SC के फ़ैसले का स्वागत करते हैं। कई दशकों के विवाद पर आज SC ने निर्णय दिया। वर्षों पुराना विवाद आज ख़त्म हुआ। मेरी सभी लोगों से अपील है कि शांति एवं सौहार्द बनाए रखें।’ अरविंद केजरीवाल, मुख्यमंत्री, दिल्ली
  •  ‘परमपूज्य बाबा साहेब डा भीमराव अम्बेडकर के धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत मा सुप्रीम कोर्ट द्वारा रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद के सम्बंध में आज आम सहमति से दिए गए ऐतिहासिक फैसले का सभी को सम्मान करते हुए अब इसपर सौहार्दपूर्ण वातावरण में ही आगे का काम होना चाहिए ऐसी अपील व सलाह।’  मायावती, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश
  • ‘सुप्रीम कोर्ट ने आज अयोध्या विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुनाया है। मैं और हमारी पार्टी इस निर्णय का सम्मान करते है। उम्मीद है कि सभी राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन इस फैसले का आदर करेंगे।’  शरद पवार, राष्ट्रीय अध्यक्ष, एनसीपी
  •   ‘उच्चतम न्यायालय के फैसले का दिल से स्वागत करता हूं। यह छण मेरे लिए मनोकामना पूर्ण होने का है। ईश्वर ने मुझे विशाल आंदोलन में योगदान देने का अवसर दिया। मैं खुद को धन्य महसूस कर रहा हूं। उच्चतम न्यायालय ने एकमत से अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया है और अब समय आ गया है कि विवाद एवं कटुता को पीछे छोड़कर सांप्रदायिक एकता और सहमति को गले लगाया जाए।’   लालकृष्ण आडवाणी, वरिष्ठ नेता भाजपा
  •  ‘आज भारत के इतिहास में एक स्वर्णम दिन है। भगवान राम के जन्म को लेकर विवाद रहा है कि उनका जन्म कब हुआ, कहां हुआ, हुआ भी या नहीं हुआ। इस पर आज न्यायालय ने विराम लगा दिया है। अदालत के फैसले का हम स्वागत करते हैं।’      उद्धव ठाकरे, शिवसेना प्रमुख
  • ‘जब तक दुनिया कायम रहेगी, हम इस देश के शहरी बने रहेंगे। हम भले नहीं रहें लेकिन आने वाली पीढ़ियों को यह बताकर जाएंगे कि जिस स्थान पर 5000 साल से मस्जिद थी, उसे 6 दिसंबर 1992 को संघ परिवार ने ढहा दिया और सुप्रीम कोर्ट को गलत जानकारी दी गई। मस्जिद की जमीन का सौदा नहीं किया जा सकता। मैं अपने घर का सौदा कर सकता हूं लेकिन मस्जिद की जमीन का सौदा नहीं किया जा सकता।’  असदुद्दीन ओवैसी, अध्यक्ष एआईएमआईएम
  • ‘यह एक ऐतिहासिक फैसला है। जनता से अपील करता हूं कि शांति बनाए रखें।’ राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री
  •  ‘कोर्ट ने एक निष्पक्ष किंतु दिव्य निर्णय दिया है। मैं आडवाणी जी के घर में उनको माथा टेकने आई हूं। आडवाणी जी ही वे व्यक्ति हैं जिन्होंने छद्म-धर्मनिरपेक्षता को चेलैंज किया। उन्हीं की बदौलत आज हम यहां तक पहुंचे हैं।’                                  उमा भारती, पूर्व केंद्रीय मंत्री 
  •   ‘यदि हमारी समिति तैयार होती है तो हम पुर्नविचार याचिका दाखिल करेंगे। यह हमारा अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के नियमों में भी यह है।’  जफरयाब जिलानी, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड
  •   ‘हमने हमेशा से यही कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी निर्णय होगा, वह हमें मंजूर होगा। मैं उम्मीद करता हूं कि देश अब विकास की ओर अग्रसर होगा। जहां तक सवाल है पुर्नविचार याचिका के दाखिल करने का तो मैं इस बात से सहमत नहीं हूं।’ सैयद अहमद बुखारी, शाही इमाम, जामा मस्जिद दिल्ली
  •  ‘यह ऐतिहासिक फैसला है। भव्य राम मंदिर बनना चाहिए। मुझे भरोसा है कि हिंदू भाई मस्जिद बनने में भी मदद करेंगे।’           बाबा रामदेव, योग गुरु
  • ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुझे मान्य है। हम पूरे देशवासियों से अमन-चैन और सौहार्द बनाए रखने की अपील करते हैं। माननीय न्यायालय का फैसला सभी लोगों को स्वीकार करना चाहिए।’  इकबाल अंसारी, मुस्लिम पक्षकार
  • ‘हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं। यह मामला दशकों से चल रहा था और यह सही निष्कर्ष पर पहुंच गया है। इसे जीत या हानि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हम समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए सभी के प्रयासों का भी स्वागत करते हैं।’   मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख
  •   ‘यह एक ऐतिहासिक निर्णय है, मैं इसका स्वागत करता हूं। यह मामला लंबे समय से चल रहा था और आखिरकार यह एक निष्कर्ष पर पहुंच गया है। समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखा जाना चाहिए।’  श्री श्री रविशंकर, आध्यात्मिक गुरु

‘इसके बदले 100 एकड़ जमीन भी दे तो भी कोई फायदा नहीं है। हमारी 67 एकड़ जमीन अभी भी ले रखी है तो इसके बाद 5 एकड़ दे रहे हैं। यह कहां का इंसाफ है ?’  कमाल फारुकी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

अयोध्या विवाद टाइमलाइन

1528:  अयोध्या में मुगल सम्राट बाबर ने मस्जिद का निर्माण किया।
1853:  पहली बार इस इलाके में सांप्रदायिक दंगे हुए।
1859: ब्रिटिश शासन ने विवादित स्थल पर पहरा लगाया। परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को नमाज पढ़ने और बाहरी हिस्से में हिन्दुओं को प्रार्थना करने की अनुमति।
1885: निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुबर दास की मंदिर निर्माण इजाजत संबंधी अपील अदालत में खारिज।
1946:  बाबरी मस्जिद को लेकर शियाओं और सुन्नीयों के बीच विवाद। फैसला सुन्नियों के पक्ष में।
1949:  22-23 दिसंबर को मस्जिद में राम सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रखी गई।
1949: 29 दिसंबर को यह संपत्ति कुर्क की गई और वहां रिसीवर बिठा दिया गया।
1950: 16 जनवरी को गोपाल दास विशारत बेरोकटोक पूजा के अधिकार की मांग को लेकतर अदालत गए। अदालत ने कहा मूर्तियां नहीं हटेंगी, लेकिन ताला बंद रहेगा और पूजा सिर्फ पुजारी करेगा।
1959: निर्मोही अखाड़ा अदालत पहुंचा और जमीन पर दावा पेश किया।
1961: सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने अदालत पहुंच कर मस्जिद का दावा पेश किया।
1986: एक फरवरी को फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने जन्मभूमि का ताला खुलवा कर पूजा की इजाजत दी।
1986:  बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन।
1989: वीएचपी नेता देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला की तरफ से मंदिर के दावे का मुकदमा किया।
नवंबर 1989 में विश्व हिंदू परिषद ने राजीव गांधी सरकार की इजाजत के बाद बाबरी के पास राम मंदिर का शिलांयास किया।
25 सितंबर 1990: बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से रथ यात्रा शुरू की। देश के कई हिस्सों में दंगे भड़के। 23 अक्टूबर को बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी।
30 अक्टूबर 1990 : अयोध्या में राम जन्मभूमि आन्दोलन के लिए पहली कारसेवा हुई। कारसेवकों ने मस्जिद पर चढ़कर झंडा फहराया। दंगे भड़के।
1991: जून में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबर्दस्त जीत। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।
6 दिसंबर 1992:  बाबरी मस्जिद गिराई गई। देशभर में सांप्रदायिक दंगे भड़के।
16 दिसंबर, 1992: बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया.
1994: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में बाबरी मस्जिद विध्वंस से संबंधित केस चलना शुरू हुआ.
4 मई, 2001: नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी सहित 13 नेताओं पर लगा साजिश का आरोप हटाया गया।
1 जनवरी, 2002: तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने  अयोध्या विभाग शुरू किया।
1 अप्रैल 2002: विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर इलाहबाद हाई कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।
5 मार्च 2003: इलाहबाद हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को अयोध्या में खुदाई का निर्देश दिया।
22 अगस्त, 2003: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने खुदाई के बाद इलाहबाद हाई कोर्ट में रिपोर्ट पेश की जिसमें कहा गया कि मस्जिद के नीचे दसवीं सदी के मंदिर के अवशेष मिले हैं।
मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए।
अप्रैल 2004: आडवाणी ने अयोध्या में अस्थायी राममंदिर में पूजा की।
2005: आडवाणी को अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस मामले में अदालत में तलब किया गया।
2005: अयोध्या, राम जन्मभूमि परिसर में आतंकी हमले हुए, जिसमें पांचों आतंकियों सहित छह लोग मारे गए।
20 अप्रैल 2006: यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान देकर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को सुनियोजित षड्यंत्र बताते हुए भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिवसेना पर आरोप लगाया।
2006: सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ कांच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव रखा जिसकास मुस्लिम समुदाय ने यह कहते हुए विरोध किया कि यह अदालत के यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश के खिलाफ है।
30 जून 2009:  गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी।
24 नवम्बर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश। आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंम्हा राव को क्लीन चिट दी।
26 जुलाई, 2010: इस मामले की सुनवाई कर रही इलाहबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने फैसला सुरक्षित किया और सभी पक्षों को आपस में इसका हल निकाले की सलाह दी. लेकिन कोई आगे नहीं आया.
30 सितंबर 2010: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या में विवादित जमीन को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बराबर बांटने का फैसला सुनाया। तीनों पक्षकार अदालत के निर्णय से असंतुष्ठ होकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
9 मई 2011: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई।
21 मार्च 2017: सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही.
19 अप्रैल 2017: सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया.
16 नवंबर 2017: आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता करने की कोशिश की, उन्होंने कई पक्षों से मुलाकात की.
6 अगस्त 2019:  मध्यस्थता से कोई नतीजा नहीं निकल सका जिसके बाद छह अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई।
16 अक्टूबर 2019: अयोध्या विवाद की सुनवाई पूरी। फैसला सुरक्षित।
9 नवंबर 2019 : सर्वोच्च अदालत ने फैसला सुनाया। विवादित स्थल को राम जन्म भूमि स्थान घोषित किया। मस्जिद निर्माण के लिए मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ जमीन देने का निर्णय।

दस्तावेज, जिनका दिया गया हवाला

राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद के 1045 पन्ने के ऐतिहासिक फैसले में पांच जजों की पीठ ने कई किताबों और दस्तावेजों का जिक्र किया है। ये वे दस्तावेज हैं जिन्हें सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी दलील में प्रस्तुत किया था।

बृहद धर्मोत्तर पुराण –  इसके एक श्लोक, ‘अयोध्या मथुरा माया काशी कांची ह्मवन्तिका, पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका’ का हवाला दिया गया जिसका अर्थ यह है कि, अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जैन) और द्वारावती (द्वारका) भारत में सात सबसे पवित्र स्थान हैं ।

रामायण : वाल्मीकि  – इसका हवाला देते हुए बताया गया कि, राम का जन्म राजा दशरथ के महल में हुआ था और उनकी माता का नाम कौशल्या था. हालांकि अदालत ने माना कि रामायण में राम के जन्म की जगह नहीं बताई गई है।

स्कंद पुराण – इसके वैष्णव खंड का हवाला देते हुए कहा गया कि, राम का जन्मस्थान विघ्नेश्वर के पूर्व, विशिष्ठ के उत्तर और लोमेश के पश्चिम में है।

रामचरित मानस : तुलसीदास – इसके बालकंड अध्याय का हवाला देते हुए कहा गया कि, भगवान विष्णु ने कहा था कि वो कोशलपुरी में कौशल्या और दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।

हैन्स टी बेक्कर का शोधपत्र –  हैन्स टी केक्कर ने सन 1984 में ग्रोनिन्जेन विश्वविद्यालय में अयोध्या पर अपना शोधपत्र दिया था जो दो वर्ष वाद पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। इसका हवाला देते हुए बताया गया कि, इसमें राम जन्मभूमि, बाबरी मस्जिद और अन्य जगहों के मानचित्र हैं जो सन 1980  से 1983 के बीच बनाए गए थे।

आईन-ए-अकबरी : अबुल फजल – इसका हवाला देते हुए बताया गया कि अवध भारत के सबसे बड़े शहरों और हिंदुओं के लिए पवित्र स्थानों के रूप में है। आईन-ए-अकबरी के हवाले से बताया गया कि भगवान के नौ अवतारों में से एक राम भी हैं जिनका जन्म त्रेता युग में चैत्र के महीने के नौवें दिन अयोध्या में दशरथ और कौशल्या के घर पर हुआ था।

अर्ली ट्रैवल्स इन इंडिया : विलियम फिंच का यात्रा वृतातं –  विलियम फिंच ने साल 1610 से 1611 के बीच ने भारत की यात्रा की थी। अपने यात्रा वृतांत में उन्होंने अयोध्या मॆं रामचंद्र के महल और घरों के अवषेशों का जिक्र किया है।

मोन्टगोमरी मार्टिन और जोसेफ टिफेन्टालर का यात्रा वृतांत – मोन्टगोमरी मार्टिन और जोसेफ टिफेन्टालर ने 18 वीं सदी में भारत की यात्रा की थी। इन दोनों एंग्लो-आइरिश अधिकारियों के यात्रा वृतांत के हवाले से कहा गया कि विवादित ज़मीन पर हिंदू सीता रसोई, स्वर्गद्वार और राम झूले की पूजा करते थे। साथ ही 1856 से पहले बड़ी संख्या में लोग यहां परिक्रमा करते थे।

जोसेफ टिफेन्टालर का यात्रा वृतांत – इसके अनुसार औरंगजेब ने रामकोट नाम के एक किले पर जीत पाई और फिर इसे मिटा कर इसकी जगह तीन गुंबद वाली मस्जिद बनाई।

ईस्ट इंडिया गजेटियर : गजेटियरवाल्टर हैमिल्टन – 1828 में प्रकाशित इस गजेटियर का हवाला देते हुए कहा गया कि हिंदू धर्मावलंबी अवध को पवित्र स्थान मानते थे और यहां पूजा अर्चना करते थे। यहां राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान के मंदिर हैं।

मोन्टगोमरी  मार्टिन का गजेटियर – 1838 में प्रकाशित इस गजेटियर में दर्ज विस्तृत व्यौरों का हवाला दिया गया.

गजेटियर आफ इंडिया : एडवार्ड थार्नटन – 1856 में प्रकाशित इस गजेटियर में दर्ज विस्तृत व्यौरों का हवाला दिया गया.

हदीत-ए-सेहबा : मिर्जा जान – इसका हवाला देते हुए राम जन्म भूमि वाले स्थान के  के निकट सीता रसोई की बात कही गई। इसी किताब के मुताबिक सन 1571 में बाबर ने यहा मस्जिद का निर्माण कराया था।

अवध के थानेदार शीतल दूबे की रिपोर्ट – 28 नवंबर 1858 की इस रिपोर्ट के मुताबिक सन 1858 में इस क्षेत्र में साम्प्रदायिक तनाव हुआ था।
पी कार्नेगी की रिपोर्ट-  अयोध्या और फैजाबाद के आफिशिएटिंग कमिश्नर एंड सेटलमेंट आफिसर पी कार्नेगी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि अयोध्या का हिंदुओं के लिए वही महत्व है जो मुस्लिमों के लिए मक्का और यहूदियों के लिए यरूशलम का है। इसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि सन 1528 में बाबर ने यहां मस्जिद बनवाई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कहा है कि हिंदू और मुस्लिम दोनो यहां पूजा करने आते थे। साथ ही रिपोर्ट में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच तनाव का भी –जिक्र भी किया गया है।
प्रिंस अंजुम की याचिका – आल इंडिया शिया  कांफ्रेस, लखनऊ के अध्यक्ष प्रिंस अंजुम की याचिका का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि भारत के मुसलमान प्रभु राम को ऊंचा दर्जा देते हैं।

‘राम’  :  मुस्लिम चिंतक डाक्टर शेर मोहम्मद इकबाल की कविता –

‘है राम के वजूद पे हिन्दोस्तान को नाज़,

अहले नजर समझते हैं उसको इमामे हिंद ’

 

न्यायमूर्ति 

  1. जस्टिस रंजन गोगोई, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया

हाल ही में (17 नवंबर) रिटायर्ड हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने पांच जजों की इस पीठ की अगुवाई की। जस्टिस गोगोई ने ही नौ नवंबर को इस फैसले को पढ़ा। जस्टिस गोगोई ने पिछले वर्ष तीन अक्टूबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश का पदभार ग्रहण किया था। गुवाहाटी हाईकोर्ट से अपने कैरियर की शुरुआत करने के बाद वे वर्ष 2001 में गुवाहाटी हाई कोर्ट में न्यायाधीश बने थे। वर्ष 2010 में वे पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में बतौर जज 2010 नियुक्त हुए और अगले वर्ष वहीं चीफ जस्टिस बने। 23 अप्रैल, 2012 को जस्टिस रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुकित हुए। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए जस्टिस गोगोई ने कई ऐतिहासिक मामलों में निर्णय सुनाया।

  1. जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े

हाल ही में (18 नवंबर) देश के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए जस्टिस शरद अरविंद बोडड़े (एसए बोबड़े) भी अयोध्या रामजन्मभूमि- बाबरी मस्जिद जमीनी विवाद मामले में फैसला देने वाले पांच जजों की पीठ में शामिल रहे। जस्टिस बोबड़े ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच में वकालत से कैरियर शुरू किया। वर्ष 2000 में वे बॉम्बे हाई कोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त हुए। वर्ष 2012 में वे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। अगले ही वर्ष 2013 में उन्हें उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बनाया जस्टिस एसए बोबड़े 23 अप्रैल, 2021 को रिटायर होंगे।

  1. जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़

जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ (डीवाई चंद्रचूड़) 13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त हुए थे। उनके पिता जस्टिस यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बनने से पहले वे इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। उससे पहले वे बॉम्बे हाई कोर्ट में जज नियुक्त हुए थे। न्यायाधीश बनने से पहले वे देश के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं। वह जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ कई ऐतिहासिक मामलों की सुनवाई कर चुके हैं जिनमें सबरीमाला, भीमा कोरेगांव, समलैंगिकता जैसे मामले प्रमुख हैं।

  1. जस्टिस अशोक भूषण

जस्टिस अशोक भूषण वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीश नियुक्त हुए। उससे पहले वे वर्ष 2015 में केरल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त हुए। इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत शुरू करने के बाद वे वर्ष 2001 में बतौर जज नियुक्त हुए।

  1. जस्टिस अब्दुल नज़ीर

जस्टिस अब्दुल नज़ीर 17 फरवरी, 2017 को सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त हुए। वर्। 1983 में कर्नाटक हाईकोर्ट में वकालत शुरू करने के बाद वे बाद में वहां बतौर एडिशनल जज और फिर पूर्णकालिक न्यायाधीश नियुक्त हुए।

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