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यूपी के बाहुबली !

Archive Report : Apr,2016 , सत्यजीत पंवार , 

     आदिकाल से लालच, पाखंड, धोखा, जाल-बट्टा, अय्यारी और मक्कारी सत्ता प्रतिष्ठानों के जरूरी हिस्से रहे हैं। यूरोप और एशिया का इतिहास खंगाल डालें, षड्यंत्र, गुप्तचरी और दुरभिसंधियों के ढेरों दृष्तांट यहां—वहां बिखरे मिल जाएंगे। भारत के संदर्भ में बात करें तो पिछले एक हजार साल के दौरान देश ने शासनतंत्र के अलग—अलग रंग देखे। राजे—रजवाड़ों का दौर रहा हो या मुगलों या अन्य मुस्लिम आक्रमणकारियों का शासन रहा हो। या फिर ब्रिटिश रूल का काला अध्याय, इन सभी को सत्ता चलाने के लिए किसी न किसी रूप में अपराधी मानसिकता वाले लोगों का सहारा लेना पड़ा है। आजादी के बाद भी लोकतंत्र नाम की नई व्यवस्था के तहत भारतीय राजनीति खुद को अपराध से मुक्त नहीं कर पाई।  स्वतंत्रता के बाद काफी समय तक देश के अधिसंख्य राज्यों पर कांग्रेस का शासन रहा। केंद्र पर तो उसका एकछत्र राज रहा। नेहरू के बाद जब सत्ता की बागडोर इंदिरा गांधी के हाथों में आई तो दंभ और तानाशाह प्रवृत्ति के साथ उन्होंने देश अपनी उंगली पर नचाना शुरू किया। जेपी आंदोलन के उदय के साथ जब इंदिरा की निरंकुशता के खिलाफ आवाजें बुलंद होने लगीं तो उन्होंने देश पर इमरजेंसी थोप दी। इस दौर तक अपराधी खुले रूप में राजनीति में पैठ बनाना शुरू कर चुके थे। राजनीतिक दमन का विरोध कर रहे लोगों को कुचलने  के लिए कांग्रेस शासित राज्यों में सरकारों ने जरायम पेशा तत्वों की मदद लेनी शुरू कर दी। बदले में अपराधियों मिलते थे बड़े सरकारी ठेके और संरक्षण। 1980  के दशक में उत्तर प्रदेश और बिहार में अपराधियों की समानांतर सरकारें चलनी शुरू हो गई थीं। अब हालात ये हैं कि कई राजनीति दल शेर रूपी माफियातंत्र पर सवार हैं। ये सवारी दलों को काफी महंगी पड़ रही हैं, लेकिन पार्टियों को शेर खौफ पैदा कर उन्हें वोट दिलाने में अहम रोल अदा करता है। राजनीतिक दल यह भी जानते हैं कि अब शेर से उतरे तो वह उन्हें खा जाएगा। माफियातंत्र और राजनीति के गठजोड़ के मामले में उत्तर प्रदेश बिहार से उन्नीस नहीं बैठता। जेपी आंदोलन की कोख से निकले  क्षेत्रीय दलों ने अपराधियों के मुंह में सत्ता के खून का स्वाद लगाने में महती भूमिका अदा की। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाज पार्टी, अपने राजनीतिक लाभ के लिए दोनों दलों ने जमकर अपराधियों और माफिया तत्वों को टिकट दिए।
अब उत्तर प्रदेश अपनी सत्रहवीं विधानसभा के चुनाव करने की तैयारी कर रहा है। जेल में बंद एमएलसी ब्रजेश सिंह ने अपनी पत्नी अन्नपूर्णा के लिए सैयदराजा क्षेत्र से तैयारी की है । हाल में संपन्न एमएलसी के चुनाव में जेल में रहते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में माफिया डॉन बृजेश सिंह की जीत ने एक बार फिर इस बहस को हवा दी है कि क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति कभी अपराध के चंगुल से मुक्त हो पाएगी। क्या राजनीतिक दल जीतने की ‘योग्यता‘ को ध्यान में रखकर इस बार भी अपराधियों को टिकट देने से नहीं हिचकिचाएंगे।
सुधारों की तमाम कवायद के बावजूद उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में बाहुबलियों का दखल और उनकी जरूरत बढ़ती जा रही है।  जातीय और दलीय समीकरण साधने के साथ ही क्षेत्रीय क्षत्रपों को गोलबंद करने के लिए माफियातंत्र राजनीतिक दलों की अहम जरूरत बन गया है। उत्तर प्रदेश में 2017 का विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा होने में अभी काफी महीने हैं, लेकिन जेल में बंद माफिया डॉन से लेकर जमानत पर रिहा बाहुबलियों ने टिकट की जुगत तेज कर दी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में माननीय बनकर पहुंच चुके बहुत सारे माफिया डॉन ने अपनी गोटियां चलनी शुरू कर दी हैं।  पिछले चुनाव में बसपा, भाजपा, कांग्रेस, आरएलडी, आईएनडी, पीस पार्टी, कौमी एकता दल ने दिल खोलकर बाहुबलियों को टिकट दिए थे।

मुख्तार अंसारी
उत्तर प्रदेश के माफिया राजनेताआें में मुख्तार अंसारी सिरमौर माने जाते हैं। उनके विरुद्ध हत्या, अपहरण, फिरौती सहित कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।1989 में मुलायम सिंह के पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में मुख्तार को सत्ता का संरक्षण मिला। भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के सिलसिले में  दिसम्बर 2005 से आगरा जेल में बंद मुख्तार की सियासी सल्तनत वहीं से चलती है। मऊ के लोग उन्हें रॉबिन हुड मानते हैं और यही वजह है कि वह जेल में हो या बाहर, विधानसभा का चुनाव जरूर जीतते हैं। कौमी एकता दल के बैनर तले वह तीन बार विधासभा का चुनाव जीत चुके हैं।  सूत्र बताते हैं कि जेल में मुख्तार की सक्रियता काफी बढ़ गई है। वह वहीं से बैठकर यूपी 2017 के अपने मास्टर प्लान के तहत अपराधियों और दलीय संतुलन साधने में लगे हैं। एक समय में बसपा प्रमुख मायावती के करीबी रहे मुख्तार लंबे समय तक लखनऊ जेल में भी रहे और वहीं से बैठकर साम, दाम, दंड और भेद के नुस्खों के तहत अपना सियासी कारोबार चलाते रहे हैं।

मुन्ना बजरंगी
गाजीपुर जिले में मोहम्मदाबाद क्षेत्र के विधायक कृष्णानन्द राय की हत्या के सिलसिले में झांसी जेल में बंद माफिया मुन्ना बजरंगी ने पिछले विधासभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की मड़यिाहूं सीट से किस्मत आजमाई थी, लेकिन विफल रहे थे। बताते हैं कि इस बार भी वह इसी सीट से विधानसभा पहुंचने के लिए बेताब हैं। लेकिन उनके लिए मुश्किलें भी बहुत हैं। महज पंद्रह साल की उम्र में जुर्म की दुनिया में कदम रखने वाले मुन्ना बजरंगी का उत्तर प्रदेश में खासा आतंक हैं। दिल्ली पुलिस के साथ मुठभेड़ में गोलियां लगने के बाद चमत्कारिक रूप से बच गए मुन्ना पर हत्या, लूटपाट, रंगदारी वसूलने के कई मामले दर्ज हुए। बताते हैं कि जब अबू सलेम को पुर्तगाल से भारत लाया गया तो डी कंपनी ने सलेम को मारने की सुपारी मुन्ना बजरंगी को दी थी, लेकिन यह साजिश परवान नहीं चढ़ सकी। साले पुष्पजीत की हत्या ने मुन्ना को कमजोर कर दिया है। झांसी जेल में रहते हुए मुन्ना की दोस्ती पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया सरगना अनिल दुजाना से हो गई थी। सूत्र बताते हैं कि कारोबारी साझेदारी में तब्दील  हो चुकी यह दोस्ती जाहिर है चुनाव में रंग दिखाएगी। उसने पिछली बार जौनपुर के  पर चुनाव लडक़र तीसरा स्थान हासिल किया और इस बार वह भी किसी भी हाल में किला फतह करना चाहता है।

राजा भैया
अखिलेश सरकार में मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ  राजा भैया का आपराधिक इतिहास रहा है। राजा भैया ने एेसे—एेसे कारनामों को अंजाम दिया है जिससे वो हमेशा सुॢखयों में रहे हैं।  चाहे मामला मारपीट, डकैती या हत्या का हो, राजा भैया ने हर काम दबंगई से अंजाम दिया। राजा भैया के तालाब से कंकाल बरामद होने का मामला तो कई दिनों तक सुॢखयां बना रहा था। मायावती के शासनकाल में राजा भैया पोटा कानून के तहत भी जेल में रह चुके हैं, हालांकि अब ये कानून खत्म हो चुका है। इसके अलावा राजा भैया पुलिस ऑफिसर जियाउल हक की हत्या के भी आरोपी रहे हैं, जिन्होंने उनके घर पर छापा मारा था। इस पुलिस अधिकारी की संदेहास्पद परिस्थिति में सडक़ हादसे में मौत हुई थी। अब इस मामले में राजा भैया को क्लीन चिट मिल गई है। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान राजा भैया ने चुनाव आयोग में जो हलफनामा जमा किया, उसके मुताबिक उनके खिलाफ आठ मामले लंबित हैं। इनमें हत्या की कोशिश, हत्या के इरादे से अपहरण, डकैती जैसे मामले शामिल हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश गैंगेस्टर एक्ट के तहत भी उनके खिलाफ मामला चल रहा है। मिशन2017 के हिसाब से बात की जाए तो राजा भैया के मिजाज बदले हुए हैं। खबर है कि उनका झुकाव भाजपा की तरफ हो गया है।

अतीक अहमद
समाजवादी पार्टी से जुड़े अतीक अहमद 2004 से 2009 तक फूलपुर (इलाहाबाद) से लोकसभा सदस्य रहे। बसपा विधायक राजू पाल की हत्या समेत उन पर फिरौती और मारपीट के लगभग 35 मुकदमें चल रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने उन्हें 2008 में निकाल दिया था, जिसके बाद उन्होंने 2009 का चुनाव ‘अपना दल’ के टिकट से लड़ा पर हार गए। इलाहाबाद में उन्हें माफया सरगना के तौर पर जाना जाता है। बीते कुछ दिनों पहले अतीक अहमद समेत 14 लोगों पर धूमनगंज इलाके में मां—बेटे पर गोलाबारी करने के संदर्भ में शिकायत दर्ज कराई गई। जानकारी की मानें तो यह विवाद काफी लंबे वक्त से चल रहा है। खबर है कि अपना दल अतीक को विधानसभा का टिकट देने की तैयारी में है। अतीक कहां से चुनाव लडेंगे, इसकी घोषणा होनी बाकी है।

अमरमणि त्रिपाठी
कभी हरिशंकर तिवारी गैंग के सदस्य रहे अमरमणि का पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में काफी दबदबा है। 1980 में महराजगंज की लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट पर बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही ने जब पहली बार जीत दर्ज की, तब अमरमणि त्रिपाठी उनसे मुकाबिल थे। अमरमणि फिलहाल मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं और अब जेल से अपने पुत्र अमनमणि के लिए सियासी जमीन तैयार करने में जुटे हैं।अमन मणि पर भी अपनी पत्नी की हत्या का आरोप है। जेल में रहते हुए अमरमणि ने साल 2012 में अमनमणि को समाजवादी पार्टी के टिकट पर लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से उतरवाया था, लेकिन वह चुनाव हार गया था । सूत्र बताते हैं कि अमरमणि बेटे की जीत के लिए नए सिरे से ब्ल्यू प्रिंट तैयार कर रहे हैं।

अनिल दुजाना सहित और भी कई सक्रिय
जबकि पश्चिम के अपराधियों में सुंदर भाटी और बुलंदशहर के अनिल दुजाना भी जेल से ही माननीय बनने की संभावना तलाश रहे  हैं। दुजाना ने पिछले दिनों पंचायत चुनाव लडऩे की कोशिश की थी, लेकिन नाकाम रहे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में रंगदारी और हत्या के मामलों में आरोपी दुजाना के समर्थकों ने बादल पुर में चुनावी होर्डिंग्स लगाए थे, जिन्हें पुलिस ने उतार दिया। खबर है कि दुजाना आजाद उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव लडऩे की तैयारी में है।  जेल में बंद कुख्यात नक्सली लालब्रत कोल और पश्चिम में फरार चल रहे कुख्यात विनय त्यागी जैसे भी मौके की तलाश में हैं।

मदन भैया
लोनी में विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े नेता विधानसभा का टिकट पाने के लिए जोड़-तोड़ कर रही हैं, वही माफिया से माननीय बने मदन भैया पर सबकी नजर टिकी है। सूत्रों के मानें तो मदन भैया राष्ट्रीय लोकदल या भाजपा से भी टिकट की चाह रख रहे हैं। वह खेखड़ा सीट से कई बार जीते हैं। इस बार लोनी विधानसभा सीट पर गुर्जर और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, ऐसे में मदन भैया अपने आप को  गुर्जर नेताआें में शीर्ष  पंक्ति में दिखाकर अलग अलग पार्टियों से टिकट की दावेदारी ठोकेंगे , वर्ष-2012 विधानसभा चुनाव के दौरान मदन भैया को हार का सामना करना पड़ा था।

डीपी यादव
पश्चिम उत्तर प्रदेश के बड़े शराब कारोबारी के रूप में पहचान बनाने वाले धर्मपाल उर्फ डीपी यादव पर दर्जनों के हिसाब से संगीन आरोप हैं। दिल्ली, उत्तराखंड हरियाणा तक फैला रसूख का साम्राज्य। बेटा विकास चॢचत नीतीश कटारा हत्याकांड में सजा काट रहा है। डीपी यादव पर वर्ष 1989 में गाजियाबाद जिले के कविनगर थाने में पहला मुकदमा दर्ज हुआ। वर्तमान में हत्या के 9, डकैती के 2 मुकदमों के अलावा अपहरण, गैंगस्टर और टाडा जैसे मुकदमे शामिल हैं। इसके साथ ही जेसिका लाल हत्याकांड में भी यादव और उसके बेटे विकास का नाम आरोपियों में शामिल है। 1989 में बुलंदशहर से पहली बार विधायक बने फिर मुलायम सिंह सरकार में मंत्री बाद में सियासी चोला बचाये रखने तक के लिए राष्ट्रीय परिवर्तन दल बनाया। इसके पहले भी सपा बसपा सहित कई दलों में रहे। 2007 में अपने दल से पत्नी उॢमलेश सहित विधायक चुने गए। बाद में बसपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। 2012 विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने आपराधिक छवि के चलते सपा में लेने से इनकार कर दिया था। पता चला है कि जेल में पड़े डीपी भी इस बार यूपी विधानसभा चुनाव में उतरने की जुगत में हैं, लेकिन सियासत के जानकारों का मानना है कि उनका राजनीति का खेल लगभग खत्म हो गया है। हालांकि डीपी का भतीजा जीतेन्द्र यादव जरूर भाजपा के टिकट पर एमएलसी का चुनाव लड़ा ।

गुड्डू पंडित
भगवान शर्मा ऊर्फ गुड्डू पंडित की छवि के बारे में सभी को पता है। बसपा में थे तो सपा के स्थानीय लोगों ने बुलंदशहर व डिबाई में गुड़्डू पंडित के खिलाफ आंदोलन किया। सदन में भी हंगामा किया। गुड्डू पंडित पर लगभग 24 से अधिक आपराधिक मामले हैं। वाहन चोर से नेता बना गुड्डू नोएडा के सेक्टर-24 थाने का हिस्ट्रीशिटर रहा है। गुड्डू पंडित इस समय सपा से विधायक हैं। उनके भाई भी विधायक हैं। गुड्डू की पत्नी काजल शर्मा को भी पहले लोकसभा प्रत्याशी बनाया गया था, लेकिन बाद में टिकट काट दिया गया।  गुड्डू शर्मा को मायावती सरकार ने जेड श्रेणी की सुरक्षा दी थी। जाहिर है कि चुनाव 2017 में गुड्डू पंडित को समाजवादी पार्टी रिपीट उम्मीदवार बनाएगी।

सदन में माफिया का बोलबाला  
अब सदन में बाहुबलियों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी हो रही  है। माफिया डाॅन बृजेश सिंह के एमएलसी बनने के बाद माननीयों में बाहुबलियों की संख्या बढ़ गई है। बृजेश के अलावा बाहुबली विधायक विजय मिश्रा की पत्नी रामलली मिश्रा, राजा भैया के संबंधी अक्षय प्रताप सिंह भी एमएलसी बन गए हैं। वहीं मुख्तार अंसारी, राजा भैया, अभय सिंह, विजय मिश्रा, पंडित सिंह, रामचंद्र सिंह प्रधान, अजीमुल हक पहलवान, सुशील सिंह, विजय सिंह, अजय राय, अखिलेश सिंह आदि पहले से ही विधानसभा व विधान परिषद के सदस्य हैं।

ये भी हैं बेताब
विधानसभा पहुंचकर माफिया से माननीय में तब्दील होने की चाहत फैजाबाद के गोसाईगंज के अभय सिंह, वाराणसी पिंडरा के अजय राय, सकलडीहा से सुशील सिंह, रायबरेली के अखिलेश सिंह, एटा के अलीगंज के रामेश्वर यादव, चित्रकूट के वीर सिंह, भदोही ज्ञानपुर के विजय मिश्रा और बुलंदशहर के डिबाई विधायक भगवान शर्मा गुड्डू जैसे लोग भी पाले बैठे हैं। इनके अलावा इलाहाबाद के बाहुबली अतीक अहमद, बीकापुर के जितेंद्र सिंह बबलू, हमीरपुर के अशोक कुमार सिंह, खीरी के अरविन्द गिरि, जौनपुर के धनंजय सिंह (सभी पूर्व विधायक) भी सपा या बसपा का टिकट पाने के लिए जोड़-तोड़ में लगे हैं। फेहरिस्त यही खत्म नहीं होती। मेरठ के धर्मेंद्र किरठल और भूपेंद्र बाफर , मुज़फ्फरनगर के शाहनवाज़ राणा हों या गाजीपुर के अरुण सिंह, देवरिया के अजीत शाही जैसे बड़े दागी भी चुनाव लडऩा चाह रहे हैं।

मुकदमों का सामना कर रहे विधायक
समाजवादी पार्टी : 111 विधायक
बसपा : 29
भाजपा : 25
कांग्रेस : 13
(2012 की एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफामर्स की रिपोर्ट के मुताबिक)
2012 में 577 अपराधी लड़े थे चुनाव  उत्तर प्रदेश में 2012 में कुल 6839 उम्मीदवारों ने अपनी तकदीर आजमाई थी। नेशनल इलेक्शन वॉच ने इनमें 672 उम्मीदवारों के शपथपत्र खंगाले तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
1312 प्रत्याशियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज थे
इनमें भी 577 उम्मीदवारों पर गंभीर धाराआें में मुकदमे थे।
58 मंत्रियों में से 29 पर आपराधिक मामले हैं
98 पर हत्या व दुष्कर्म जैसे संगीन आरोप
यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि 98 जनप्रतिनिधियों (कुल का 24 फीसदी) के खिलाफ हत्या, अपहरण व दुष्कर्म जैसे गंभीर आपराधिक मामले न्यायालयों में चल रहे हैं।

बसपा, भाजपा, कांग्रेस, आरएलडी, आईएनडी, पीस पार्टी, कौमी एकता दल बाहुबलियों और दबंगों को टिकट दिया था।

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