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अयोध्या विवाद का ऐतिहासिक समाधान

आखिरकार देश के सबसे विवादित, सबसे संवेदनशील और सबसे जटिल मसले का समाधान हो गया। नौ नवंबर को सर्वोच्च अदालत ने जैसे ही अयोध्या राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद मालिकाना विवाद पर फैसला सुनाया, यह तारीख इतिहास की किताब में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। पांच जजों की पीठ ने हर पक्ष की सभी दलीलों को सुनने, साक्ष्यों की पड़ताल करने और हर तरह से संतुष्ठ होने के बाद इस मामले में फैसला सुनाया है। सबसे अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में मंदिर और मस्जिद दोनों के निर्माण की राह खोल दी है। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल का मालिकाना हक रामलला के नाम कर हिंदुओं के बहुप्रतीक्षित राम मंदिर निर्माण का रास्ता तैयार करने के साथ ही अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ जमीन देने का निर्देश देकर मुस्लिम धर्मावलंबियों की आस्था का भी पूरा सम्मान किया है। सुप्रीम कोर्ट ने जहां विवादित स्थल पर रामलला के मालिकाना हक की बात कही, वहीं साफ शब्दों में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने को भी गैरकानूनी करार दिया। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर देशभर से आ रही प्रतिक्रियाओं का सार यही है कि इस फैसले में किसी भी पक्ष की हार नहीं हुई।

किसी भी समाज की असल परीक्षा संकट के समय होती है। संकट के समय ही पता चलता है कि लोगों के मन में भाईचारे का प्राणतत्व बचा है या नहीं। इस लिहाज से देखें तो अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह देश के आम लोगों ने शांति और सौहार्द का परिचय दिया उससे सिद्ध होता है कि भारत की बहुरंगी संस्कृति बेहद बेहद समृद्ध है। इसी तरह देश के कानून के प्रति पूर्ण सम्मान दिखा कर भारत वासियों ने लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी होने का भी शानदार उदाहरण दुनिया के सामने रखा। इस फैसले के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि हजारों वर्षों से चला आ रहा हमारा भाईचारा भविष्य में और भी मजबूत होगा ।

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