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कैंसर को हराकर 100 रुपये में मरीज ठीक कर देते हैं डॉ येशी

नई दिल्ली: कैंसर से जिंदगी की जंग लड़ रहे कई लोग जो उम्मीद छोड़ चुके थे उन्हें भिक्षु डॉक्टर येशी धोंडेन ने तिब्बती चिकित्सा पद्धति के द्वारा नया जीवन प्रदान करने का काम किया है। जो लोग यह समझते हैं कि कैंसर का इलाज बहुत महंगा होता है उनके लिए डॉ येशी की ये तिब्बति चिकित्सा किसी वरदान से कम नहीं है, जिसका खर्च महज 100 रुपये है। कई मरीजों के जीवन में उम्मीद की किरण जगाने वाले 85 वर्षीय डॉ येशी पूरे 20 साल (1960-80) तक दलाईलामा के निजी चिकित्सक के तौर पर उन्हें सेवाएं प्रदान की हैं। इससे साफ जाहिर है कि उनकी चिकित्सा में दम तो है।

धर्मशाला स्थित तिब्बती हर्बल क्लिनिक में सुबह पांच बजे ही मरीजों की कतार लग जाती है। मरीजों को पहले टोकन लेना होता है जिसके तीन दिन बाद डॉ येशी उन्हें देख पाते हैं। चूंकि हर मरीज का गहन परीक्षण जरूरी होता है इसलिए डॉ येशी एक दिन में सिर्फ 45 लोगों की ही जांच कर पाते हैं। जांच के बाद मरीज को दवाई दी जाती है वो भी सिर्फ 100 रुपये में दो महीने की खुराक।

डॉ येशी अपने हुनर को पेशे से ज्यादा समाजसेवा का नाम देते हैं जिसके चलते उन्होंने देश-विेदेश में खूब ख्याति पाई, यहां तक कि भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। हालांकि डॉ येशी इस सम्मान को लोगों की दुआओं का असर मानते हैं और वे इससे खुश भी बहुत हैं।

वे कहते हैं कि पिछले 50 वर्षों में मैंने तिब्बती चिकित्सा से हजारों मरीजों को ठीक किया है। शायद यह उनकी दुआओं का ही असर है। तिब्बती चिकित्सा भारतीय आयुर्वेद का ही उत्कृष्ट रूप है। बौद्ध धर्म के विस्तार के दौरान सातवीं सदी में यह दवाइयां भारत से तिब्बत पहुंचीं। इसके बाद यह और विकसित होती चली गईं। डॉ येशी धर्मशाला स्थित तिब्बतियन चिकित्सा संस्थान के प्रमुख भी रहे हैं।

इसका श्रेय पिछले 50 वर्षों में मेरे इलाज से ठीक हुए हजारों मरीजों को जाता है। यह अच्छा है कि तिब्बतियन चिकित्सा पद्धति की वजह से हजारों मरीज ठीक हुए हैं। तिब्बतियन दवाइयां भारत में ही पैदा होती हैं इसलिए यह भारतीय आयुर्वेदा से मिलती-जुलती हैं। तिब्बतियन दवाइयां 7वीं शताब्दी में तिब्बत में भारत से बुद्धिज्म से लाई गई थीं। भारत सरकार ने शुरू से ही तिब्बतियन दवाओं को विशेष पहचान दी है। उन्होंने कहा कि वह तिब्बतियन चिकित्सा संस्थान धर्मशाला के प्रमुख भी रहे हैं।

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