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लॉकडाउन की मार अन्नदाता पर भारी, मजदूर भी परेशान

अजीत सिंह / बिजनौर

एक तरफ जहां कोविड19 महामारी के खौफ़ से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की सांसें रुक गयी हैं। तो वहीं देश का बदहाल और कर्ज के बोझ में दबा अन्नदाता रात दिन खेतों में काम करने में व्यस्त है। वो अपनी जमा कुंजी को फसलों की बुआई और कटाई में इसलिए लगा रहा है कि देश में कोई भूखा ना रहे।
पेश है एक रिपोर्ट :

गौरतलब है कि कोरोना वायरस से दुनियाभर में लगातार बढ़ रहे संक्रमण के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशभर में लॉकडाउन की अवधि को 3 मई तक बढ़ा दिया है। लॉकडाउन बढ़ने से पूरे देश में किसानों के सामने समस्या भी खड़ी हो गई है। एक तरफ जहां यह लॉकडाउन दिहाड़ी और छोटे कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को भारी पड़ रहा है। तो वहीं दूसरी तरफ किसानों के लिए भी मुसीबत का सबब बनता जा रहा है। साथ ही इस बढ़े लॉकडाउन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के सामने भारी संकट खड़ा करने वाला साबित हो रहा है जिससे पहले से ही बदहाल हुए किसानों की स्तिथि सुधरने की बजाय और गंभीर होती जा रही है। जो किसानों के सामने मुसीबतों का पहाड़ खड़ा करने के साथ साथ उनकी आर्थिक समस्यों को बढ़ाने में भी अपनी अहम भूमिका अदा कर रहा है।

उत्तरी भारत का शुगर बाउल कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान गन्ने की कटाई और उसे चीनी मिलों तक पहुंचाने के साथ साथ गन्ने की बुआई में व्यस्त है। भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष दिगम्बर सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का करीब 12 हज़ार करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान चीनी मिलों पर बकाया है। जो किसानों को समय से नही मिल पा रहा है और अब देश में लॉकडाउन बढ़ने के कारण चीनी की खपत कम होने और चीनी की बिक्री में आई गिरावट के चलते चीनी मिलों ने अपनी पिराई क्षमता भी कम कर दी है। जिससे किसान अपने गन्ने की फसल को समय से नही बेच पा रहा है। किसानों का अभी भी 25 से 30 प्रतिशत गन्ना खेतों में खड़ा है। अगर ऐसे में मिलें बन्द हो गयी तो किसानों का गन्ना खेतों में ही सूख जायेगा। जो किसानों को कर्ज के बोझ तले लाकर खड़ा कर देगा।

कोरोना महामारी के चलते देश में लॉकडाउन का समय बढ़ने से किसानों के सामने भी भविष्य में भारी संकट आने के आसार नज़र आ रहे हैं। देश में लॉकडाउन-2 के दौरान आने वाले दिन किसानों के लिए कैसे मुश्किल पड़ते जाएंगे। इस बारे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों से बात की। बिजनौर के नांगल सोती क्षेत्र के किसान रुकन राजपूत बताते हैं कि लॉकडाउन की अवधि बढ़ने की वज़ह से सबसे ज्यादा प्रभावित गन्ना किसान दिखाई दे रहा है। लॉकडाउन के बावजूद चीनी मिलें बंद न होने से किसानों को थोड़ी राहत जरूर मिली है। मगर लॉकडाउन के बहाने चीनी मिलें गन्ना मूल्य भुगतान पर कुंडली मारकर बैठ गई हैं। इसका प्रभाव किसानों पर विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की आर्थिक स्थिति पर बहुत ज्यादा पड़ेगा। अकेले बिजनौर जिले में 1100 करोड़ रुपए से ज्यादा अवशेष गन्ना मूल्य भुगतान हो चुका है। जिससे गेहूं की कटाई और गहाई तो किसी तरह हो जायेगी, मगर उसकी खरीद सरकार सुनिश्चित कर पायेगी या नहीं, इसकी अभी तक कोई गारंटी नहीं है। हालांकि सरकार ने कहा है कि जल्दी ही किसानों के गेंहू की खरीद के लिए व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। जिसकी बाट किसान अभी भी जोह रहा है।

उधर क्षेत्रीय किसान हेमेन्द्र सिंह का कहना है कि लॉकडाउन के कारण पूरा गन्ना मिल पर नहीं जा पा रहा है। बचे हुए गन्ने को गुड़ के कोल्हू पर बेचना मजबूरी है। लेकिन होली के बाद से कोल्हू चले ही नहीं। पहले वे बारिश की वजह से बंद रहे, उसके बाद कोरोना के चक्कर में लेबर उपलब्ध नहीं हो पायी। अब सरकार की तरफ से कोल्हू चलाने की मनाही नहीं है। लेकिन गुड़ का उठान न होने की वजह से इलाके में इक्का-दुक्का कोल्हू ही चल रहे हैं। वहां भी गन्ने का रेट सरकार के रेट से बहुत कम है। जिसके चलते किसान को 75 से 100 रुपये प्रति क्विंटल कम रेट पर अपना गन्ना बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। बिजनौर के क्षेत्रीय किसान देवेंद्र सिंह ने बताया कि गेंहू की फसल पक कर तैयार है। लॉकडाउन के चलते गेंहू की कटाई के लिए मजदूर की भी कमी है। अगर सरकार मनरेगा को खेती से जोड़ दें तो किसी हद तक मजदूर की समस्या हल हो सकती है क्योंकि किसान मजदूरी देने के लिए तैयार है। किसान ने किसी तरह गेंहू की कटाई कर भी ली तो फ़िर किसान को गहाई के लिए पापड़ बेलने पड़ेंगे। साथ ही अभी तक सरकार ने किसानों के गेंहू को खरीदने की कोई व्यवस्था ही सुनिश्चित नही की है।

यह तो सही है कि सरकार ने किसानों की फसलों को रोगों से बचाने में काम आने वाली कीटनाशक दवाओं की दुकानों को खोलने की मौहलत दी है लेकिन किसानों के खेतों में गेंहू की पकी हुई फ़सल के बारे में अभी तक कोई संवेदनशीलता नही दिखाई है। हालांकि की सरकार ने कहा है कि वो किसानों को कोई दिक्कत नही होने देगी और जल्दी ही गेंहू की कटाई और गहाई में काम आने वाले यत्रों की मरम्मत की दुकानें खोलने की व्यवस्था करेगी और साथ ही गेंहू ख़रीद केंद्र खोलेगी। आजाद किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष किसान राजेन्द्र सिंह का कहना है कि किसान कभी लॉकडाउन नही हो सकता। किसान की गेंहू की फसल पक कर तैयार है लेकिन गेंहू की कटाई और गहाई में काम आने वाले यंत्रों और मशीनों की मरम्मत करने वाले कारीगरों की दुकानें अभी भी बंद हैं जिसके चलते अगर गेंहू की फसल को काट भी लिया तो उसकी गहाई के लिए किसान के पास कोई चारा नही है। ऐसे में किसी तरह गेंहू की कटाई कर ली तो उसकी गहाई में काम आने वाली थ्रेशर मशीन की मरम्मत करने या उसे ठीक करने वाले उपलब्ध नहीं होंगे तो किसान गहाई कर ही नही पायेगा। अगर सरकार गेंहू की कटाई और गहाई में इस्तेमाल होने वाले यंत्रों और मशीनों को ठीक करने वाले मैकेनिकों को लॉकडाउन के दौरान जल्द से जल्द दुकानें खोलने की छूट नही देती है तो यह तय है कि किसानों को आने वाले समय में भयंकर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा जिसकी क्षतिपूर्ति कर पाना संभव नहीं होगा।

देशभर में बढ़ाया गया लॉकडाउन जहां किसानों के लिए मुसीबत का सबब बनता जा रहा है तो वहीं इससे गाँव देहात में रहने वाले दिहाड़ी मजदूरों के साथ साथ शहरों में रोजमर्रा का काम करने वालों के लिए भी नुकसान दायक सिद्ध हो रहा है। लॉकडाउन के चलते जो मजदूर शहरों में जाकर अपने परिवार के लालन पालन के लिए मेहनत मजदूरी या कारखानों में नौकरी करते थे वे मजदूर भी लॉकडाउन के कारण सब कुछ बन्द हो जाने के चलते अपने अपने गावों को लौट आए हैं जिससे गाँव मे समस्या और गंभीर हो गयी है लोगों के पास काम नही है। अब ऐसे में लॉकडाउन की समय सीमा बढ़ जाने से गावों में इसके भयंकर परिणाम देखने को मिलेंगे। भट्टे पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर अंकित कुमार का कहना है कि लॉकडाउन में सब बन्द होने से उन्हें काम नही मिल रहा है ज्यादातर मजदूर काम ना मिलने से घरों में खाली बैठे हैं। वहीं गेंहू काटने की दरांती मरम्मत करने वाले मजदूर कैलाश सिंह ने बताया। कि लॉकडाउन के चलते गाँव के लोगों का शहर में आना जाना रुक गया है। इसलिए लोग अपने जरूरत के काम के लिए कहीं आ जा नही सकते हैं। इसलिए वह भी गेंहू की कटाई में काम आने वाली दरांती की मरम्मत करने के लिए गाँव गाँव जाकर मजदूरी कर रहा है। जिससे थोड़ा बहुत मज़दूरी बन रही है। अब सरकार ने ऐसे हालात में लॉकडाउन की समय सीमा बढ़ा दी है जिससे उसके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जायेगा। और देश मे और ग़रीबी होगी। उधर ई-रिक्शा चालक विकास कुमार का कहना है कि वो ई-रिक्शा चलाकर अपने परिवार को पाल रहा था लॉकडाउन के कारण लोगों का कहीं भी आना जाना बंद हो गया है जिससे उसका काम भी बंद हो गया है। जो जमा पूंजी पास थी वो भी सब खर्च हो गई। अब उधार लेकर काम चल रहा है। लॉकडाउन बढ़ने से उसके सामने भी रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

साथ ही इस लॉकडाउन के चलते दिहाड़ी मजदूर, खेत मजदूर या भूमिहीन गरीब मजदूरों के पास गेहूं खरीदने की आर्थिक ताकत शायद ही बचेगी, इसका सीधा नुकसान किसान को भी होगा। लॉकडाउन के बाद भी किसानों के सामने बड़ी आर्थिक समस्या आने वाली है। वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते किसानों की फसलों की मंडियों में मांग घटेगी तथा उन्हें उनकी फसलों के लाभकारी दाम नहीं मिल पायेंगे। जबकि लागत मूल्य बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।

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