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गैरसैंण को लेकर नेता छोड़ो, क्या सच में जनता भी गंभीर है?

गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाये जाने की मांग को लेकर आयोजित जनसभा में हरीश रावत ने एक वाजिब प्रश्न उठाया कि क्या गैरसैंण को लेकर राज्य के, और यहां तक कि खुद गैरसैंण के लोग भी गम्भीर हैं?
मुझे भी यही लगता है कि गैरसैंण अब सिर्फ प्रतीकात्मक अथवा भावनात्मक मुद्दा भर रह गया है। मैं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के बयान को विस्तार देते हुए कहना चाहूंगा कि गैरसैंण में न सिर्फ विधायकों को, बल्कि जनता को भी ठंड लगती है।

पर्वतीय गांवों से देहरादून और हल्द्वानी की ओर हो रहा निर्लज्ज पलायन इसका उदाहरण है। हम पहाड़ी लोग अपनी शुद्ध हवा, पानी और विस्तीर्ण भू सम्पदा को छोड़ देहरादून में गन्दा पानी और हवा को भोगने वहां धड़ा धड़ बस रहे हैं। देहरादून में ज़मीन के जिस रत्ती भर टुकड़े पर हम माचिस की डिब्बी जैसे तीन कमरे बना कर फूले नहीं समाते, उससे ज़्यादा जगह पर पहाड़ में हमारी बकरियां अथवा मुर्गियां रहती हैं।
मुझे चूंकि कोई चुनाव नहीं लड़ना है, और सोशल मिडिया पर ट्रोल होकर गाली खाने की मुझे आदत सी पड़ गयी है, अतः अपना कथन पुनः दुहराना चाहूंगा, कि अन्य राज्यों में नेता भ्रष्ट हैं, जबकि उत्तराखंड में जनता नेताओं से अधिक भ्रष्ट है। यहां दिन रात गांव समाज मे रहने वाला ग्राम प्रधान किसी मंत्री के बराबर अथवा उससे अधिक भ्रष्ट है। अपना गांव छोड़ जिला मुख्यालय पर रहने वाले ग्राम प्रधानों की तादाद 50 फीसदी से कम नहीं है।
ध्यान रहे कि देहरादून में चाहे कितनी भी बड़ी कोठी बना लो, लेकिन वहां सदैव दूसरे दर्जे के नागरिक ही रहोगे।

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