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अब पैदल नहीं करनी होगी कैलाश मानसरोवर यात्रा

SATYAVOCIE.COM डेस्क की रिपोर्ट 

विश्व प्रसिद्ध कैलाश मानसरोवर यात्रा (KAILASH MANSAROVAR YATRA) अब आसान हो गई है। क्योंकि बीते साल सड़क कटने से गाला और सिर्खा के बीच की 24 किलोमीटर की दूरी कम हो गई थी। जिससे तीर्थ यात्री धारचूला बेस कैंप से गाड़ी की मदद से सीधे बूंदी पहुंचने लगे थे। लेकिन अब बीआरओ ने घटियाबगड़ से लिपुलेख दर्रे तक सड़क काट दी है। जिसके बाद अब दुनिया का सबसे कठिन धार्मिक सफर इतिहास बन गया है। अब  मानसरोवर यात्रियों को सिर्फ एक ही पड़ाव पर रुकना पड़ेगा।

हिमालय की प्रतीकात्मक तस्वीरें पद्म सम्मान से सम्मानित नैनीताल के मशहूर फोटोग्राफर अनूप साह जी की फेसबुक वॉल से ली गई हैं।

केवल हिंदू धर्म का केंद्र नहीं है कैलाश मानसरोवर

कई धर्मों को मानने वालों के लिए आस्था का केंद्र है. हिंदुओं के अलावा ये स्थल बौद्ध, जैन और तिब्बती धर्म के अनुयायियों के लिए भी पवित्र है. यही वजह है कि आदिकाल से ही हिंदू कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के दर्शनों के लिए जाते रहे हैं। लेकिन समय के साथ इस दुर्गम पैदल यात्रा में कई बदलाव आए हैं।

हिमालय की प्रतीकात्मक तस्वीरें पद्म सम्मान से सम्मानित नैनीताल के मशहूर फोटोग्राफर अनूप साह जी की फेसबुक वॉल से ली गई हैं।

साल 1961 से पहले बिना रोक-टोक होती थी यात्रा

भारत-चीन युद्ध (War) से पहले हिंदू तीर्थ यात्री स्वतंत्र रूप से भगवान शिव के दर्शन को पहुंचते थे। लेकिन साल 1961 में चीन (China) ने स्वतंत्र यात्रा पर पूरी तरह रोक लगा दी। 1981 में ये यात्रा फिर बहाल हुई। लेकिन ये बहाली कई नियम बन गए। मसलन यात्रा के दिन, यात्रियों की संख्या और जत्थों की संख्या। 1981 से धार्मिक यात्रा में वीजा और पासपोर्ट भी जरूरी हो गया। 1981 से लंबे अर्से तक मानसरोवर यात्रा में आठ पैदल पड़ाव हुआ करते थे। इन पैदल पड़ावों को पार करने के लिए यात्रियों को 80 किलोमीटर का हिमालय में कठिन सफर तय करना होता था। जिसमें कई यात्री दुर्घटना का भी शिकार हुए।

हिमालय की प्रतीकात्मक तस्वीरें पद्म सम्मान से सम्मानित नैनीताल के मशहूर फोटोग्राफर अनूप साह जी की फेसबुक वॉल से ली गई हैं।

पोर्टर्स परेशान

कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की मदद पोर्टर करते थे। पोर्टर सामान ढोने का काम करते थे। साथ ही यात्रियों को चढ़ने में मदद करते थे। लेकिन सड़क बन जाने से ये लोग परेशान हैं। क्योंकि इनका अब  कोई इस्तेमाल नहीं है।

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