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किसान दिवस : रस्मों की अदायगी

दीगर रस्मों की तरह हर साल चौधरी चरण सिंह की जयंती 23 दिसंबर को किसान दिवस मनाकर हम रस्म की अदायगी करते हैं। उनकी समाधि पर कुछ फूल—मालाएं चढ़ाई जाती हैं। कुछ सेमिनार होते हैं। बाकी अगले साल।किसानों के मसीहा चौधरी साहब के अंदर ताउम्र एक खांटी किसान आबाद रहा, लेकिन खेती के उन्नत तरीकों और काश्त की मार्केटिंग के आधुनिक पैटर्न के वे शुरू से कायल रहे। वह कहा करते थे कि अन्नदाता (किसान) सुखी तो देश सुखी। काश्तकार से जुड़ी समस्याओं के निराकरण के लिए चरण सिंह के सुझए रास्तों पर अमल किया गया होता, तो देश और किसान दोनों खुशहाल होते।

ज्यादा उपज देकर भी देश का किसान बदहाल है। खाद, उन्नत बीज से किसान ने अपनी उपज तो बढ़ा ली है, लेकिन अपनी पैदावार को खपाने के लिए उसके पास साधन नहीं हैं। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान खेती छोड़कर दिल्ली और मुंबई का रुख कर रहे हैं, तो इसके लिए सीधे तौर सरकारें जिम्मेदार हैं।
मिसाल के तौर पर पंजाब में इस साल आलू की बंपर फसल हुई है, लेकिन किसान रो रहा है। राज्य सरकार ने किसानों के समक्ष बेलआउट पैकेज की पेशकश की थी, जिसे किसानों ने ठुकरा दिया। अब उन्होंने धमकी दी है कि अगर सरकार उनकी पैदावार की कारगर व्यवस्था नहीं करती, तो वह सड़कों को आलू से पाट देंगे। वहां किसानों के पास 25 लाख टन आलू है और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि करें क्या।
आमतौर से इस तरह के मसले पर तीन तरह के सुझव आते हैं। पहला अतिरिक्त कोल्ड स्टोरेज का निर्माण, दूसरा, चिप्स और फ्रेंच फ्राई जैसे आलू प्रसंस्करण में सार्वजनिक और निजी निवेश को बढ़ावा और अंतिम वोदका निर्माण के प्लांट खड़े करना। ये सभी दीर्घकालिक योजना से जुड़े सुझव हैं।
सबसे पहले, सबसे जरूरी है बाजार ज्ञान को सुदृढ़ करना। नदी जोड़ो आंदोलन की तरह, हमें बाजार जोड़ो मुहिम छेड़नी होगी। यानी उत्पाद का समान वितरण। यह काम उपज मानचित्र बनाकर किया जा सकता है। यह देश की जरूरत के आधार पर होना चाहिए। किस उपज की देश को कितनी जरूरत है। इसके लिए कृषि विभाग, राज्यों की विपरण एजेंसियों तथा उत्पादक संघों को मिलकर काम करना चाहिए। अगर किसी एक फसल की ज्यादा उपज की जरूरत नहीं है, तो उपज क्षेत्र बढ़ने से रोकना चाहिए। जैसे पंजाब के किसानों को पिछले साल आलू के अच्छे दाम मिले थे, लिहाजा इस साल सभी आलू पर पिल पड़े। नतीजा सामने है। किसानों को बहु फसलों की तरफ मोड़ना चाहिए। इससे जोखिम कम होगा। चौधरी चरण सिंह चाहते थे कि विदेशों से केवल उोग—धंधों के तौर-तरीकों की प्रेरणा न ली जाए, बल्कि खेती के आधुनिक तरीके भी सीखे जाएं।
दरअसल, हमने कभी किसानों की समस्याओं की तरफ ठीक से ध्यान ही नहीं दिया। हमारे राजनेताओं के लिए किसान हमेशा से वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं। पार्टियों के अपने किसान मोर्चे और फोरम तो हैं, लेकिन उनका सियासी इस्तेमाल ज्यादा होता है।
पहले महाराष्ट्र के विदर्भ से किसानों की आत्महत्या की खबरें सुर्खियों में रहती थीं, अब देश के हर कोने से ऐसी मनहूस खबरें आती हैं। हमने उदारवाद पर राह पर चलकर स्वदेशी बड़े, मझोले और छोटे उोग—धंधों का गला घोंट दिया। खेती सिर्फ घाटे का सौदा रह गई है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हमारे बाजार पर कब्जे के बाद हमारे खेतों पर नियंत्रण शुरू कर दिया है। सरकार की आंखों में कृषि क्षेत्र में दी जा रही सब्सिडी खटक रही है।
किसान देश की कृषि नीति और खेती के प्रति सरकार की उदासीनता से इतने नाराज हैं कि पिछले दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया जब उदन गांव के दौरे पर गए तो सरकार की वादा—खिलाफी के विरोध में कई किसान कुएं में कूद गए। बाद में गांव वालों ने रस्सियों से उन्हें बाहर निकाला।
वैसे देखा जाए तो आज के हालात के लिए हमारी योजनाएं जिम्मेदार हैं। हमने विकास के नेहरू-राजीव—मनमोहन सिंह मॉडल को अपनाया, लेकिन उसमें चौधरी साहब के किसान मॉडल को शामिल करना भूल गए। चरण सिंह का मानना था कि देश में जो चीजें आसानी से बनाई जा सकती हैं, उन्हें विदेशों से मंगाना अथवा उनमें विदेशी हस्तक्षेप देश की अर्थ-व्यवस्था को चौपट कर देगा। उन्होंने देश को एक वैकल्पिक अर्थ नीति, दर्शन और विचार दिया। वह लघु व कुटीर उोगों कामगारों, बुनकरों और दस्तकारों की बात करते थे। इसके उलट हम अंतरराष्ट्रीय बाजार, विशेषकर अमेरिका के दबाव में आते चले गए। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत पर राज कर रही हैं। रही—सही कसर चीन ने पूरी कर दी है। सरकार ने देशी दस्तकारों और कारीगरों को नजरंदाज किया। आज चीनी उत्पाद से बाजार पटे पड़े हैं। चरण सिंह चाहते थे कि किसान देश का मालिक बने, यानी ऐसी अर्थनीति बनाई जाए, जिसमें कृषि सबसे ऊपर हों
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