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महाराष्ट्र का सियासी सबक

लगभग एक महीने तक चली सियासी उठापटक के बाद महाराष्ट्र में नई सरकार बन गई। इस एक महीने के दौरान देश की जनता ने सियासत का हर वो रंग देखा जिसके लिए राजनीति बदनाम है। सत्ता हासिल करने के लिए साम,दाम,दंड,भेद करने से लेकर विचारधारा को तो किनारे रखा ही, साथ ही जनादेश को भी हाशिए पर डाल दिया गया। वर्षों से एक-दूसरे के हमराही रहे दलों ने कुर्सी के लिए न केवल अपनों का साथ छोड़ दिया, बल्कि ठीक विपरीत विचारधारा वाले दलों के साथ नाता जोड़ लिया। इस सबके बीच राज्यपाल पद की गरिमा को लेकर सवाल भी उठे तो संविधान दिवस के दिन देश की सर्वोच्च अदालत ने कानून की महत्ता को भी एक बार फिर सिद्ध किया।

बहरहाल महीनेभर के सियासी ड्रामे के बाद महाराष्ट्र को उद्धव ठाकरे के रूप में नया मुख्यमंत्री मिल गया है। उद्धव ठाकरे के लिए नई सरकार चलाना उनके जीवन की सबसे बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि जिन दो दलों एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से वे सत्ता तक पहुंचे हैं उनकी और शिवसेना की विचारधारा में 360 डिग्री का अंतर है।

सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा सरकार बनाने में भले ही नाकाम रह गई मगर उसके लिए विपक्ष में बैठ कर मंथन करने का यह उचित वक्त है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और गृहमंत्री अमितशाह की राजनीतिक सूझबूझ के बावजूद पिछला कुछ समय भाजपा के लिए अनुकूल नहीं रहा है। हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी, जबकि इन दोनों राज्यों में लोकसभा चुनाव में पार्टी को प्रचंड जीत मिली थी।

हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद अब झारखंड विधानसभा के चुनाव सामने हैं। झारखंड में इस बार राजनीतिक दलों ही नहीं बल्कि जनता की भी इस मायने में परीक्षा है कि महाराष्ट्र के घटनाक्रम से उसने कोई सबक लिया या नहीं।

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