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मदर्स डे स्पेशल: जीवन क्या है मां धरती पर तूने मुझे सिखाया

मैंने धरती पर जब आंखे खोलीं
खुद को माँ के आंचल में पाया
जीवन क्या है धरती पर
माँ यह सब तूने सिखलाया

मुझे सुलाने के खातिर माँ तुम
रात भर लोरी गाती थी
बिस्तर पर मुझे सुलाकर
जमीं पर खुद सो जाती थी
माँ तुम कितनी भोली हो
माँ तुम कितनी प्यारी हो

मेरा चेहरा उदास देख तुम
खुद उदास हो जाती थी
मेरी कमियों को छुपा तुम
खुद गुनहगार बन जाती थी

गुस्सा कितना भी हो तुझमें
मुझे देख हंस जाती थी
मुझ पर संकट आये कभी तो
ढाल तुम बन जाती थी

पापा जब भी आंख दिखाये
तुम उनको समझाती थी
मेरी खुशियों के खातिर माँ तुम कितने कष्ट उठाती थी

घर का सारा कामकाज तुम
खुद पूरा निपटाती थी
मुझसे इतना प्यार था तुमको
हर पल गले लगाती थी

माँ बड़ा हो गया हूँ मैं अब
सोच रहा हूँ कैसे तेरा कर्ज चुकाऊँ
तेरी ममता का मोल नहीं है
यह दुनिया को कैसे समझाऊँ

कविता के लेखक जितेन्द्र पंवार हैं। जितेंद्र उत्तराखंड के चमोली से टेलीविजन पत्रकारिता करते हैं। उन्होंने ये कविता अपनी प्यारी मां के नाम लिखी है। 

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