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नितिन यादव जी की पहली किताब।

आदतन वन सीटिंग में पूरी किताब पढ़ डाली। इस पुस्तक को पढऩे का सबसे अहम कारण निश्चित रूप से यही था कि इसे नितिन जी ने लिखा है और यह जिज्ञासा मन में थी कि उन्होंने कैसा लिखा होगा। विनम्रता के साथ पहले इस पुस्तक के कमजोर पक्ष (जो मुझे लगा) पर रोशनी डालना चाहूंगा। मेरा मानना है कि लेखक बहुत तेजी से सब कुछ कह देना चाहता है। मुख्य किरदार के साथ हादसे बहुत ज्यादा हुए और सभी को लेखन की माला में पिरोया गया जिससे कुछ ऐसे वृतांत भी एक सीमा में कैद होकर रह गए जिन्हें और विस्तार से लिखा जाना चाहिए था। जो इस पुस्तक की जान थे। कुछ हादसों को भले ही छोड़ दिया जाता पर खास हादसों पर अपनी कलम का दायरा और बढ़ाना चाहिए था। दूसरा, इसमें कोई शक नहीं कि जिस कुरीति और वर्जना को प्रतिबिंबित करने लिए यह पुस्तक लिखी गई वह बेमिसाल है। लेकिन समाज के जिस कुरूप चेहरे को आप दिखाना चाहते थे वह कहां दिखा पाए। आपकी कलम क्यों ठिठक गई। सिर्फ छूकर क्यों छोड़ दिया। चलने दिया होता अपनी लेखनी को उस पराकाष्ठा तक जब तक कि उन्मुक्तता का बोध अपने शिखर को न चूम लेता। हो सकता है किसी बड़े विद्वान ने सलाह दी हो कि यह अति हो जाएगी पर यह अति होनी ही चाहिए थी। पाठक कहां समझा ? उसे तो आपने अनुमान के समंदर में गोते लगाने के लिए छोड़ दिया।

अब बात पुस्तक के मजबूत पक्ष की। पुस्तक का आगाज बेहतर तरीके से हुआ। कथाएं मूल रूप से दो ही तरीकों से समाप्त होती हैं। सुखांत और दुखांत। प्रेमचंद ने हमेशा सुखांत लिखा निश्चित रूप से उनका कोई सानी नहीं पर जो हूक शिवानी ने अपनी कहानियां, करिए छमा, ठाकुर का बेटा, लाल हवेली, मणिमाला की हंसी, पूतों वाली, कैंजा जैसी रचनाओं में दुखांत से पैदा की, वही आपकी रचना के अंत में भी पैदा होती है। इस किताब के आखिरी के आठ पन्ने मेरी नजर में इस किताब की जान हैं। यही आठ पन्ने इस किताब को विशिष्ट श्रेणी में खड़ी करते हैं। निश्चित रूप से इस दुखांत के लिए पाठक तैयार नहींं होगा पर यह दुखांत ही इस कहानी के मुख्य किरदार राहुल को पतित से पावन बनाता है। अब बात तकनीकी पक्ष पर। पुस्तक की अनुक्रमणिका का फॉन्ट साइज बहुत छोटा और टूटा हुआ है। हर कहानी के शीर्षक का फॉन्ट कम है और बिख्ररा हुआ है। छोटी छोटी टाइपिंग की गलतियां हैं।

कुल मिलाकर लेखक की यह पुस्तक आगाज के तौर पर अपनी मजबूत उपस्थिति साहित्य के आंगन में दर्ज कराती है। मुझे उम्मीद है कि अब आपके पत्रकारिता के अनुभव और खांटी ग्रामीण परिवेश के तजुर्बे इस लेखन को दिन ब दिन और मजबूत करेंगे। बध्‍ााई। शुभकामनाओं के साथ कि एक बार शुरू हुआ यह सिलसिला निर्बाध रूप से आगे बढ़ता ही जाए।

 

पत्रकार अमित मुदगल की एफबी वाल से

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