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घाट की सीढ़ियों से गिरे नरेंद्र मोदी का उपहास उड़ाए जाने के पक्ष में मैं बिल्कुल नहीं हूं!

अमरेंद्र राय

पीएम नरेंद्र मोदी कानपुर में अटल घाट की सीढ़ियों पर गिर गए। इसे लेकर उनका उपहास भी उड़ाया जा रहा है। पर मैं इसके पक्ष में बिल्कुल भी नहीं हूं। ऐसा नहीं कि मैंने नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी धारणा बदल ली है। मैं अभी भी उनकी जन विरोधी नीतियों के खिलाफ हूं।

मानता हूं कि उनकी नीतियों ने देश की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा दिया है, देश में नफरत की भावना और बढ़ा दी है और देश को अघोषित आपातकाल में झोंक दिया है। जम्मू कश्मीर को सेना के बल पर पिछले करीब चार महीने से जेल जैसे हालात में रखा है और अब पूरे उत्तर पूर्व को आग की लपट में झोंक दिया है। कई जगह सेना को उतारना पड़ा है और कश्मीर की ही तरह इंटरनेट सेवाएं बंद करनी पड़ी हैं। इसके बावजूद इनका उपहास न उड़ाए जाने के पीछे एक अलग सोच है।

बात पुरानी है। तब मैं जनसत्ता में काम कर रहा था । शंकर दयाल शर्मा देश के राष्ट्रपति थे। बहुत विनम्र और सज्जन व्यक्ति थे। एक दिन राजघाट पर शायद किसी प्रार्थना सभा में गिर पड़े। वैसे ही जैसे कल मोदी जी गिर पड़े। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें उठाया। तब सोशल मीडिया शायद नहीं था या इतना जोर नहीं था। अगले दिन अखबारों में खबर छपी। जनसत्ता अपनी खबरों के तेवर और प्रस्तुतिकरण में उन दिनों लाजवाब था।

पहले पन्ने पर टॉप बॉक्स बनाकर इस खबर को छापा। अगले दिन अख़बार देखकर और खबर पढ़कर बड़ा अच्छा लगा। खबर का भाव यह था कि शंकर दयाल जी की उम्र ज्यादा हो गई है और शरीर भी भारी हो गया है। ऐसे में वे ठीक से कार्य भी नहीं कर पाते होंगे। फिर ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाया ही क्यों गया। लेकिन दफ्तर के वरिष्ठों को यह बात पसंद नहीं आई।

प्रभाष जोशी प्रधान संपादक थे और शंकर दयाल जी के गृह राज्य मध्य प्रदेश से थे। शायद एक ही शहर इंदौर के भी। बनवारी जी संपादक थे और अपनी देसी सोच के लिए विख्यात थे। इन लोगों का कहना था कि खबर इस रूप में पेश नहीं की जानी चाहिए थी। आखिर घर का कोई बड़ा बुजुर्ग अगर गिर जाए तो हम उसे उठायेंगे या उसकी खिल्ली उड़ाएंगे। तब हम युवा थे।

वरिष्ठों की बात गले से नीचे नहीं उतरी। यही सोचा कि प्रभाष जी और शंकर दयाल जी एक ही शहर के है, इसलिए उनके बचाव में यह तर्क दिया जा रहा है। जनसत्ता उस समय सत्ता विरोधी था और वहां काम करने से हमारी मानसिकता भी कमोबेश वैसी ही हो गई है, जिसे हम आज भी अच्छा ही मानते हैं। तब जनसत्ता में शंकर दयाल जी की छपी खबर को हमने ठीक ही माना था, पर दिल में यह बात जरूर धंस गई थी कि क्या सचमुच घर का कोई बड़ा बुजुर्ग गिरेगा तो हम उसे संभालेंगे या खिल्ली उड़ाएंगे। इसी नाते मोदी जी का खिल्ली उड़ाया जाना पसंद नहीं आ रहा।

शासन की ओर से बताया गया है कि जहां मोदी जी गिरे हैं वहां की एक सीढ़ी की ऊंचाई कुछ ज्यादा थी। संभव है, मोदी जी के गिरने की यही वजह हो। पर एक और बात भी हो सकती है, जो मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं। मैं अपनी तुलना मोदी जी से तो नहीं कर सकता लेकिन एक मामले में मैं और मोदी जी समान हैं। चश्मा मैं भी लगाता हूं और मोदी जी भी।

मैं अपने अनुभव से जानता हूं कि जिस चश्मे में दूर और नजदीक दोनों का विजन होता है, उसमे सीढ़ियां चढ़ने और उतरने में काफी दिक्कत होती है और गिरने का खतरा बना रहता है। हो सकता है मोदी जी चश्मे की ही वजह से गिरे हों। पर चाहे जैसे भी गिरे हों, इसका उपहास नहीं उड़ाया जाना चाहिए। मोदी जी की उम्र अभी 69 साल है। वे शारीरिक रूप से भी काफी सक्षम हैं। कम से कम शंकर दयाल शर्मा और नरसिंह राव से तो उनके स्वास्थ्य की तुलना नहीं ही की जा सकती।

मेरी शिक्षा दीक्षा बनारस में हुई है, जहां से मोदी जी आजकल सांसद और प्रधानमंत्री हैं। वे गिरे भले कानपुर में अटल घाट की सीढ़ियों पर हों पर मुझे बनारस के घाटों की सीढ़ियां ही याद आ रही हैं। वहां की सीढ़ियों पर एक बार गुरु रामानंद शिष्य कबीर शिष्य से टकरा कर गिर गए थे। तब रामानंद के मुंह से राम राम निकला था और कबीर ने उसे अपना गुरु मंत्र मान लिया था।

बाद में कबीर ने समाज का काफी कल्याण किया। क्या ऐसा संभव है कि इस घटना के बाद मोदी जी भी कबीर की तरह हिन्दू और मुसलमानों को जोड़ने के कार्य में जुट जाएं। लगता तो नहीं, पर हो भी सकता है। मोदी है तो मुमकिन है। शायद हृदय परिवर्तन हो ही जाए।

( वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र राय की फेसबुक वॉल से )

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