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कुपोषण नही है लाइलाज, खानपान में लाए बदलाव

बातचीत व प्रस्तुति-कुलदीप तोमर

पोषण को लेकर लोगों के बीच कई तरह की भ्रांतियां होती हैं। कुपोषण का मतलब सिर्फ गरीबी ही नहीं होता है या सिर्फ कम आयवालों को यह समस्या नहीं होती है। यह भी देखा गया है कि शिक्षित और अच्छी आयवाले घरों में भी लोग कुपोषण के शिकार होते हैं। ऐसा लोगों के खान-पान की गलत आदतों और पोषक तत्वों के प्रति जागरूकता की कमी के कारण होता है। आज के सेहत में जाने कुपोषण के बारे में विस्तार से-

जाने क्या है कुपोषण ?

कुपोषण वह स्थिति में जिसमें शरीर की मांग के अनुरुप पोषक तत्व नही मिल पाते जिसके परिणामस्वरुप शरीर पोषण के अभाव में कुपोषित हो जाता है। यह स्थिति नवजात शिशु के जन्म से लेकर किसी भी उम्र में हो सकती है। यह भी कह सकते हैं कि कुपोषण का अर्थ है आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास न होना, एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूध्द करने लगता है। बहुत छोटे बच्चों खासतौर पर जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में इम्यूनिटी पॉवर कमजोर होती है जिसकी वजह से वह विभिन्न संक्रमणों की चपेट में आसानी से आने लगते हैं।

यह है कुपोषण के लक्षण

हालांकि कुपोषण के लक्षण उम्र के हिसाब से अलग-अलग होते हैं लेकिन कुछ मुख्य लक्षण निम्न है-

  • -बीएमआई के अनुरुप वजन ना बढ़ना
  • -डिप्रेशन में रहना
  • -बार-बार बिमार पड़ना
  • -शरीर में खुन की कमी हो जाना
  • -थकावट महसूस होना

बाल कुपोषण होता है बड़े स्तर पर

भारत में बच्चों में कुपोषण बहुतायात में देखने को मिलता है। हालांकि बच्चों में कुपोषण 5-6 साल की उम्र के बाद नजर आता है लेकिन चिकित्सक मानते हैं कि बच्चों में कुपोषण की शुरुआत मां के गर्भ से ही शुरु हो जाती है। गर्भधारण के समय मां के खानपान का असर गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत पर पड़ता है। जन्म के पहले साल में भी बच्चा लापरवाही की वजह से कुपोषण की चपेट में पहुंच जाता है। क्योंकि इस उम्र में वह भूख लगने पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करने में असमर्थ होता है इसलिए मां को ही बच्चें को पर्याप्त मात्रा में स्तनपान कराना बेहद आवश्यक है। आमतौर पर इस समय अपर्याप्त स्तनपान, नवजात शीशु में संक्रमण, न्यूमोनिया आदि के कारण कुपोषण की समस्या सबसे ज्यादा होती है।

अपनाएं ये तरीके, बच्चा रहेगा फिट

  • जन्म के पहले छह माह तक- जन्म के बाद छह माह तक केवल स्तनपान कराएं और
  • बच्चों को भूखा ना रखें, सेहत का रखें ख्याल
  • 6 महीने से 2 साल तक- स्तनपान के साथ पर्याप्त मात्रा में घर का बना ठोस आहार दें।
  • 2 साल से 6 साल तक- दूध, दही की मात्रा खाने में ज्यादा रखें। इस समय बच्चें की ग्रोथ अच्छी तरह होती है। साथ ही मानसिक ग्रोथ का भी ख्याल रखेँ।

 निम्न कारणों से भी हो सकता है कुपोषण

  • -अनियमित व अपर्याप्त खानपान- यदि कोई व्यक्ति शरीर की मांग के अनुरुप खानपान ग्रहण नही करता है तो वह कुपोषित हो सकता है। शरीर की जरुरत के हिसाब से विटामिन्स और मिनिरल्स मिलते रहे तो शरीर के अन्दर की मशीनरी अच्छे से काम कर पाती है।
  • -मैन्टल हैल्थ प्रोब्लम- दिमागी समस्या भी कुपोषण का एक कारण हो सकता है।
  • -डाइजेस्टिव डिसॉडर- कुछ लोग नियमित रुप से खानपान करते हैं लेकिन फिर भी कुपोषित हो जाते हैँ। ऐसे लोगों के शरीर में खाना पचने में दिक्कत होती है। इसलिए जो भोजन खाया जाता है उसके पोषक तत्व शरीर को नही मिल पाते। इस समस्या को डाइजेस्टिव डिसॉडर कहते हैं।
  • -शराब का अधिक सेवन करने से- शराब का अधिक सेवन करने से भी शरीर का पैनक्रियाज डैमेज हो जाता है। इससे शरीर की खाना पचाने की क्षमता प्रभावित होती है और शराब का अधिक सेवन करने वाले लोग कुपोषण से ग्रस्त हो जाते हैं। दूसरा शराब में कैलोरी होती है, इसका सेवन करने से शरीर को भूख कम लगती है जिसकी वजह से खाना नही खाते। परिणामस्वरुप शरीर में पोषक तत्वों की कमी होने लगती है।

यह है हमारे शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व

शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों को दो भागों में बांटा जाता है जोकि निम्न है-

  • मैक्रोन्यूट्रिएंट्स-इस प्रकार के न्यूट्रिएंट्स में प्रोटीन,  फैट और कार्बोहाइड्रेट होते हैँ। यह शरीर को एनर्जी देते हैं। मस्तिष्क को काम करने के लिए फैट की बहुत जरूरत होती है, इसके अलावा शरीर को जोड़ों में चिकनाहट बनाने के लिए भी फैट चाहिए। वही प्रोटीन शरीर के इम्यूनिटी सिस्टम के लिए जरूरी माना जाता है। प्रोटीन हार्मोन्स, स्कीन, बॉडी ऑर्गन आदि के लिए भी काफी जरूरी है। यह शरीर में टिश्यू का निर्माण करता है और पुराने टिश्यू को रिपेयर करने में भी अहम भूमिका निभाता है। कार्बोहाइड्रेट को शरीर का एनर्जी का मुख्य स्त्रोत कहा जाता है।
  • माइक्रोन्यूट्रिएंट्स-इस श्रेणी के तत्वों में विटामिन्स और मिनिरल्स होते हैँ क्योंकि शरीर को इनकी जरूरत मैक्रोन्यूट्रिएंट्स के मुकाबले बहुत कम होती है। विभिन्न अंगों को विकसित होने के लिए विटामिन्स और मिनिरल्स की जरूरत होती है। कैल्शियम और आयरन जोकि मिनिरल्स है, शरीर को बहुत जरूरत होती है। दुध, पनीर, केला आदि में कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। आयरन की मात्रा को बढाने के लिए भोजन में हरी पत्तेदार वाली सब्जियां, मछली, मांस, अंडा आदि शामिल कर सकते है। फल और सब्जियां विटामिन्स और मिनिरल्स का अच्छा श्रोत है। सब्जियों में फाइबर के अलावा विटामिन ए और सी भी भरपूर मात्रा में पाये जाते है।

जीरो फिगर के चक्कर में कहीं हो न जाएं कुपोषित?

कुछ महिलाएं जीरो फिगर के लिए खानपान पूरी तरह से छोड देती है। ऐसा सेहत के लिहाज से बिल्कुल गलत हैँ। डाइटिशियन बताती है कि शरीर को जरूरत के हिसाब पोषक तत्व देना बहुत जरूरी है,लेकिन जीरो फिगर से चक्कर में खानपान छोड़ देने वाली महिलाएं जीरो फिगर तो हासिल कर लेती है लेकिन वह कुपोषण का शिकार भी हो जाती है। जीरो फिगर हासिल करने के लिए शरीर को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व देकर आप वर्कआऊट कर सकते हैं।

ऐसे दूर करें कुपोषण

सबसे पहले बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) कराएं और यदि कोई बिमारी हो तो उसका टेस्ट कराएँ। दोनों की रिपोर्ट के आधार पर डाइटिशियन से अपना डाइट चार्ट बनवाएं। डाइटिशियन आपके डाइट चार्ट में सभी पोषक तत्वों को डालेगा जोकि आपके शरीर के लिए बेहद जरूरी है।  अपने डाइट चार्ट को अच्छे से फोलो करें। शुरुआत में महीने में दो बार दोबारा टेस्ट कराएं और देखें शरीर में कितना बदलाव आया है। यदि डाइट चार्ट फोलो करने के बाद भी सकारात्मक परिणाम नजर नही आते हैं तो डाइटिशियन से सम्पर्क कर समस्या जाने और उसका ईलाज कराएँ।

महिलाओं में एनिमिया भी कुपोषण की निशानी

एनीमिया की बिमारी भी महिलाओं में सबसे ज्यादा पाई जा रही है। लापरवाही के कारण महिलाओं में यह बिमारी काफी खतरनाक हो जाती है जिसके शरीर पर दुर्गामी परिणाम देखने को मिलते है। शरीर में रेड ब्लड सेल्स और हिमोग्लोबिन का समान्य से कम होना ही एनीमिया है। इस बिमारी से ग्रस्त मरीजों में खून की कमी के साथ साथ शरीर में ऑक्सीजन की कमी भी हो जाती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में तीस प्रतिशत महिलाएं इस बिमारी से ग्रस्त है। एनीमिया की समस्या से बचने के लिए महिलाओं को अपने खाने में हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करना चाहिए।

(मैक्स अस्पताल की डाइटिशियन नीलम सिंह से बातचीत पर आधारित)

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