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ठाकरे राज या कांटों भरा ताज ?

आखिरकार लगभग एक महीने तक चले सियासी ड्रामे के बाद महाराष्ट्र में नई सरकार का गठन हो गया। इस एक महीने की अवधि में महाराष्ट्र में चली सियासी उठापटक ने जनता को हर वो रंग दिखाया जिसके लिए सियासत और सियासतदां जाने जाते हैं। एक तरफ दोस्ती दुश्मनी में बदल गई तो दूसरी तरफ विपरीत दिशा में चलने वाले दल एक पाले में आ गए। इस सबके बीच बेहद नाटकीय तरीके से एक ऐसी सरकार भी बनी जो महज चार दिन ही चल सकी। इस सरकार की विदाई हुई तो उद्धव ठाकरे के रूप में महाराष्ट्र की जनता को नया मुख्यमंत्री मिल गया। 28 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने के बाद उद्धव ठाकरे ने 30 नवंबर को बहुमत भी साबित कर दिया है। महाराष्ट्र की सियासत में यह पहली बार है जब ठाकरे परिवार के किसी सदस्य ने सत्ता में सीधी भागेदारी की है। यूं तो शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे हमेशा से ही महाराष्ट्र की सिसायत के केंद्र में रहे, मगर उन्होंने न तो कभी चुनाव लड़ा और ना ही कोई संवैधानिक पद ग्रहण किया। बहरहाल प्रदेश की सत्ता संभालने के साथ ही उद्धव ठाकरे की असली परीक्षा शुरू हो गई है।

उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के बाद सबसे अहम सवाल यह है कि वे पूरे पांच साल तक सरकार चला पाएंगे या नहीं ? यह सवाल इसलिए मौजूं है क्योंकि उनकी सरकार जिन दो दलों, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस पार्टी की बैसाखियों के सहारे टिकी है, वे दोनों ही शिवसेना के धुर विरोधी हैं। शिवसेना और इन दोनों दलों की विचारधारा में उतना ही फासला है जितना कि आकाश और पाताल के बीच। दरअसल महाराष्ट्र की सियासत में परिस्थितियां ही कुछ ऐसी बनीं जिनके चलते चिर विरोधी होने के बावजूद एनसीपी और कांग्रेस को शिवसेना के साथ खड़ा होना पड़ा। विधानसभा चुनाव की जंग में शिवसेना-भाजपा एक पाले में थे और एनसीपी-कांग्रेस दूसरे। मगर चुनाव परिणाम के बाद शिवसेना और भाजपा के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान इस कदर बढ़ गई कि दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए। न तो भारतीय जनता पार्टी और ना ही शिवसेना के पास अकेले दम पर सरकार बनाने का बहुमत था। ऐसे में एनसीपी-कांग्रेस ने शिवसेना को समर्थन दे दिया और उद्धव ठाकरे राज्य के मुख्यमंत्री बन गए।

विचारधारा की बात करें तो जहां शिव सेना खुद को कट्टर हिदुत्व की हिमायती बताती है वहीं एनसीपी और कांग्रेस खुद को धर्मनिरपेक्षता की पैरोकार बताते हैं। ये दोनों दल जहां शिवसेना पर सांप्रदायिक उन्माद फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं वहीं शिवसेना इन दोनों खास कर कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाली पार्टी बताती रही है। इसी तरह विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने के मसले पर भी दोनों धड़ों के बीच प्रचंड असहमति है। बीफ बैन, कश्मीर, एनआरसी, तीन तलाक, समान नागरिक संहिता, धार्मिक आधार पर आरक्षण जैसे कई मुद्दों को लेकर भी दोनों की राय जुदा है। ऐसे में विचारधारा का यह बेमेल गठबंधन कब तक चल पाएगा यह बड़ा सवाल है। इस सबके बीच तीनों ही दलों के नेता पूरे पांच साल तक सरकार चलने का दावा करते आ रहे हैं।

इसके अलावा कांग्रेस-एनसीपी के अतीत की बात करें तो इतिहास उन्हें अविश्वसनीय सहयोगी के रूप में स्थापित करता है। सहयोगी दलों की सरकार को पूरे कार्यकाल तक समर्थन देने के मामले में दोनों ही दलों का रिकार्ड अच्छा नहीं है। कांग्रेस का तो इस मामले में रिकार्ड बेहद खराब रहा है। ऐसे में उद्धव ठाकरे के सामने इन दोनों को साथ लेकर चलने की बड़ी चुनौती है। उद्धव ठाकरे के साथ शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस तीनों दलों से दो-दो विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली है। माना जा रहा है कि भविष्य में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में एनसीपी और कांग्रेस अपने लिए भारी भरकम महकमे चाहेंगे। जानकारों की मानें तो यदि उद्धव लगातार दोनों दलों की डिमांड पूरी करते रहेंगे तो कठपुतली सीएम बन कर रह जाएंगे और यदि वे ना नुकर करेंगे तो एनसीपी कांग्रेस के साथ उनका टकराव बढता जाएगा। कुल मिलाकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी उद्धव ठाकरे के लिए दो-धारी तलवार से कम नहीं है।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने ज्यादा बेहतर प्रदर्शन किया है। विधानसभा चुनाव की वोटिंग के बाद तमाम न्यूज चैनलों के एक्टिज पोल में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की प्रचंड जीत और एनसीपी-कांग्रेस की करारी हार का दावा किया जा रहा था। मगर चुनाव परिणाम इसके उलट रहे। भाजपा-शिवसेना गठबंधन बहुमत हासिल करने में कामयाब रहा मगर दोनों ही दलों को उम्मीद से बहुत कम सीटें मिली। दूसरी तरफ एनसीपी-कांग्रेस दोनों को पिछले विधान सभा चुनाव से ज्यादा सीटें मिली। इसी तरह का परिणाम हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी रहा। दोनों राज्यों में उम्मीद से बेहतर परिणाम आने के बाद कांग्रेस पार्टी को संजीवनी मिल गई है। ऐसे में कांग्रेस इस संजीवनी के सहारे अन्य राज्यों में भी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए बेकरार है।

राजनीतिक जानकारों की माने तो यही वजह है कि कांग्रेस ने शिवसेना को समर्थन देकर सत्ता में भागेदारी का फैसला लिया है। देश के राजनीतिक फलक पर महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा से ही प्रभावशाली रही है। ऐसे में कांग्रेस शिवसेना की अगुवाई वाली सरकार में रहते हुए खुद की जमीन मजबूत करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेगी। इसी तरह एनसीपी भी महाराष्ट्र की राजनीति में अपना खोया गौरव वापस पाने के लिए बेकरार है। पार्टी के मुखिया 78 वर्षीय शरद पवार ने इस बार विधानसभा चुनाव में जिस तरह चुनाव प्रचार किया, उससे साफ है कि मराठा राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी शरद पवार अभी रिटायरमेंट के मूड में कतई नहीं हैं। ऐसे में पवार की भी पूरी कोशिश रहोगी कि सरकार में रहते हुए मराठा मानुष का दिल जीता जाए और पार्टी का जनाधार फिर से बढ़ाया जा सके।

कुल मिलाकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर उद्धव ठाकरे ने अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बालठाकरे का सपना पूरा जरूर कर दिया है, मगर उन्हें याद रखना होगा कि उनके सर पर कांटों भरा ताज है।

उद्धव ठाकरे के राजनीतिक सफर पर एक नजर

महाराष्ट्र के 19 वें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का जन्म 27 जुलाई, 1960 को मुंबई, तब बंबई में हुआ।

राजनीति में आने से पहले उद्धव ठाकरे फोटोग्राफी करते थे।

वर्ष 2002 में वे पहली बार सक्रिय राजनीति में आए। बीएमसी चुनाव में उन्होंने शिवसेना के चुनाव प्रबंधन की कमान संभाली और पार्टी को अच्छी जीत दिलाई।

वर्ष 2003 में चचेरे भाई राजठाकरे ने उनका नाम पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित किया जिसे स्वीकार कर लिया गया।

वर्ष 2004 में पिता बाल ठाकरे ने उद्धव को पार्टी की कमान सौंपी।

17 नवंबर 2012 को बाल ठाकरे के निधन के बाद वे पार्टी के एक मात्र छत्रप बन गए।

महाराष्ट्र का सियासी ड्रामा, कब क्या हुआ

21 अक्टूबर को मतदान के बाद 24 अक्टूबर को नतीजे आए

भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने 161 सीटें जीत कर बहुमत हासिल किया। भाजपा को 105 और शिवसेना को 56 सीटों पर जीत मिली।
एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली।

25 अक्टूबर – मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा-शिवसेना में टकराव शुरू, शिवसेना ने 50:50 फार्मूले के तहत ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद मांगा। भाजपा ने इनकार किया।

नौ नवंबर- राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता दिया

10 नवंबर – भाजपा ने बहुमत न होने की बात कह कर सरकार बनाने से इनकार किया, राज्यपाल ने शिवसेना को न्यौता दिया

11 नवंबर – केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री, शिवसेना नेता अरविंद सावंत ने इस्तीफा दिया। भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूटा।

11 नवंबर- शिवसेना ने सरकार गठन के लिए दो दिन का वक्त मांगा, राज्यपाल ने इनकार किया।

राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार बनाने का न्यौता देते हुए 12 नवंबर शाम आठ बजे तक का वक्त दिया।

12 नवंबर- किसी भी दल की सरकार न बन पाने के बाद महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। शिवसेना कोर्ट पहुंची।

23 नवंबर- महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाया गया। देवेंद्र फड़नवीस ने मुख्यमंत्री और एनसीपी विधायक दल के नेता अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

शरद पवार ने प्रेस कांफ्रेंस कर अजित पवार के फैसले को निजी फैसला बताया। एनसीपी ने अजित पवार को नेता विधायक दल के पद से हटाया। शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

26 नवंबर- सुप्रीम कोर्ट ने प्लोर टेस्ट का आदेश देते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस को 27 नवंबर शाम पांच बजे तक बहुमत साबित करने को कहा।

26 नवंबर- पहले अजित पवार और फिर देवेंद्र फड़नवीस ने इस्तीफा दिया।

28 नवंबर- उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

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