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उत्तराखंड के लाल ने छुड़ा दिए थे 1971 में पाकिस्तानी सेना के छक्के

रिपोर्ट : पवन सिंह कुंवर ( हल्द्वानी )

भारत-पाकिस्तान के बीच साल 1971 में हुए युद्ध में नैनीताल जिले में रहने वाले 15 सैनिकों ने अपने प्राणों का आहुति दे दी थी। लेकिन कुछ ऐसे सैन्य अधिकारी और सैनिक भी रहे जो इस युद्ध में हिस्सा लेने के बावजूद सुरक्षित घर लौट आए। लेकिन इन सैनिकों के जहन में आज भी युद्ध की याद ताजा है। ​

कर्नल (रि) मनोहर सिंह चौहान हल्द्वानी के सत्यलोक कॉलोनी में रहते हैं।कर्नल मनोहर चौहान बताते हैं कि वह चौथी गोरखा राइफल पहली बटालियन में तैनात थे। उनकी बटालियन 1971 में जम्मू-कश्मीर में पुंच जिले के गोलपुर सैक्टर में तैनात थी। कमिशन पाने के बाद सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर चौहान की ये पहली पोस्टिंग थी।

महज 21 साल की उम्र में सेकेंड लेफ्टिनेंट बनने के बाद चौहान को 3 दिसंबर 1971 को रेडियो मैसेज मिला कि पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया है। और इस लिहाज से गोलपुर सैक्टर की पोस्ट सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि दुश्मन के इससे आगे बढ़ने पर भारत को काफी नुकसान पहुंचा सकता था।

लेकिन लेफ्टिनेंट चौहान के सामने परेशानी ये थी कि इनके पास महज दो प्लाटुन जवान जिसमें महज 35 जवान थे। ऐसे में इतनी कम संख्या में जवान भारी-भरकम पाकिस्तानी सेना का मुकाबला कैसे करे। लेकिन सेना से कर्नल के तौर पर रिटायर हुए मनोहर सिंह चौहान ने हार नहीं मानी। और अपने साहस के दम पर पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।


दुश्मन के ऐसे छुड़ाए छक्के
कर्नल मनोहर सिंह चौहान बताते हैं कि कि जिस जगह हमारी तीन पोस्ट मौजूद थी वहां दुश्मन चारों तरफ से हम पर चारों ओर से हावी था। दुश्मन की गोली कभी भी हमको लग सकती थी। 3 दिसंबर 1971 को शाम 5 बजकर 45 मिनट पर दुश्मन के एयरक्राफ्ट श्रीनगर की तरफ उड़ते हुए दिखे।

6 बजे हमको बटालियन हेडक्वार्टर से संदेश दिया कि दुश्मन (पाकिस्तान) ने हमारे ऊपर हमला कर दिया है। शाम को जितने भी जवान पेट्रोलिंग पर गए हुए थे सभी जवानों को पोस्ट पर वापस बुला लिया गया था। शाम साढ़े सात बजे दुश्मनों ने हमारे ऊपर एलएमजी, हेवी मशीन गन, रॉकेट लॉन्चर से हमला करना शुरू कर दिया। जिससे पोस्ट के चारों तरफ मौजूद सूखी घास में आग लग गई।  हमारी पोस्ट पूरी तरह से आग का कुआं बन चुकी थी।

जिससे हमारी टेलीफोन कम्युनिकेशन खत्म हो गए और हम किसी से संपर्क भी नहीं कर पा रहे थे। रेडियो कम्युनिकेशन को पाकिस्तान ने जाम कर दिया था। कर्नल मनोहर चौहान बताते हैं कि हम अपना मोर्चा संभाले हुए खड़े थे और दुश्मन का मुंह तोड़ जवाब दे रहे थे। दुश्मन जैसे ही हमारी मारक रेंज पर आया हमने एलएमजी से लेकर रॉक लांचर और मोर्टार दागने शुरु कर दिए। जिससे काफी संख्या में दुश्मन के सैनिक मारे गए। करीब 10 से 12 पाकिस्तानी सैनिक हमारी पोस्ट में घुस आए थे जिसको हमने डायरेक्ट फायरिंग से मार डाला। और कुछ दुश्मनों को गोरखा जवानों ने खुकरी से मार डाला। गोरखा बटालियन एक स्पेशल बटालियन होती है जो खुखरी जैसे हथियारों से दुश्मनों को मारना भी जानती थी।

साढ़े सात बजे से लेकर रात साढ़े नौ बजे तक तकरीबन दो घंटे तक लड़ाई चलती रही। उनकी तरफ से भी गोला बारूद चलते रहे। लेकिन भारत देश की सेना ने कभी भी पीछे हटना नहीं सीखा और भार की सेना ने मुंह तोड़ जवाब दिया। कर्नल ने बताया की जवानों के साथ में ही खड़ा था और जवानों का हौसला बढ़ा रहा था तभी मैं जब जवानों के लिए हथियार और गोला-बारूद सप्लाई कर रहा था। तभी मैं अचानक घायल हो गया और मैंने खुद  मेराकिन इंजेक्शन लगा कर खुद को संभालाऔर सभी  जवानों को हथियार पहुंचाता रहा। कर्नल मनोहर चौहान ने बताया 2 घंटे तक लड़ाई जारी रही इसके बाद दुश्मनों ने हार मान ली और वह वापस जाने लगे दुश्मनों को धूल चटा  हुए सेना के 6 जवान भी घायल हो गए जिन का तुरंत उपचार किया गया।

कर्नल मनोहर चौहान ने बताया कि कई जवान जो की बटालियन के साथ जैसे नाई, बालबर, मास्टर जी भी होते हैं उन्होंनेभी लड़ाई के वक्त हथियार और बॉक्स ढोए जिसमें सभी जवान लहूलुहान हो गए। कर्नल ने बताया कि  इन जवानों को हथियार बॉक्स ढोलने की आदत नहीं होती है जिस वजह से यह सभी जवान लहूलुहान हो गए। कर्नल ने यह भी बताया कि दुश्मन उनकी पानी में भी जहर मिला कर वापस चले गए ना ही हमारी बटालियन के पास खाने को खाना था ना पानी। दुश्मनों से दो दिन हम लड़ते रहे और हम भी लगातार संघर्ष करते रहे और हमने दुश्मनों को धूल चटा दी।

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