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इस साल गन्ने का रकबा कम करना किसान हित में होगा

लॉकडाउन के कारण चीनी की मांग बहुत कम हो गई है। देश-विश्व में चीनी की मांग और उत्पादन के समीकरण बदल गए हैं। अतः इस साल अधिक गन्ना और चीनी उत्पादन देश हित में नहीं है। अभी से गन्ना किसानों के सामने भुगतान का संकट खड़ा हो गया है। अगले पेराई सत्र में यह भीषण रूप ले लेगा। इससे गन्ना किसानों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। अधिक गन्ना बोया गया तो खेतों में ही गन्ना नष्ट करने की नौबत आ सकती है। अभी गन्ने की बुआई तेजी से चल रही है। इस साल गन्ने का रकबा कम कर के चलना किसानों के हित में होगा।

1. लॉकडाउन के कारण देश और विश्व में चीनी की मांग और कीमतें बहुत कम हो गई है। चीनी की 75 प्रतिशत खपत संस्थानों, भोजनालयों, होटलों, कार्यालयों में या व्यावसायिक उत्पादों- मिठाइयों, चॉकलेट, आइसक्रीम, पेय पदार्थों आदि में होती है। तमाम संस्थाओं और दुकानों के बंद होने के कारण यह खपत तेजी से गिर गई है। लॉकडाउन के कारण शादी, समारोह, पार्टियां आदि भी स्थगित हो गए हैं, जिससे चीनी की मांग घट गई है।

2. पेराई सत्र 2019-20 में चीनी का प्रारंभिक स्टॉक 143 लाख टन था, उत्पादन 270 लाख टन तथा निर्यात 35 लाख टन होने की संभावना है। कोरोना संकट से पहले तक हमारी घरेलू खपत भी लगभग 270 लाख टन ही रहने की संभावना थी। सरकार ने इस वर्ष 60 लाख टन चीनी के निर्यात का लक्ष्य रखा था। बदली परिस्थितियों में केवल 35 से 40 लाख टन चीनी का ही निर्यात होने की संभावना है। मार्च से सिंतबर 2020 तक देश में चीनी की खपत अपने सामान्य स्तर से 50 से 60 लाख टन कम होने की संभावना है। अतः अगले पेराई सत्र की शुरुआत में ही चीनी का 150 लाख टन से ज्यादा का प्रारंभिक भंडार होगा। यह हमारी सामान्य परिस्थितियों में लगभग सात महीनों की खपत के बराबर है।

3. कच्चे तेल की मांग और कीमतें घट गई है। पेट्रोल में एथनॉल मिलाना भी लाभकारी नहीं है। अतः फिलहाल चीनी मिलें गन्ने से एथनॉल उत्पादन भी नहीं करेंगी।

4. शराब की दुकानें भी बंद पड़ी हैं अतः शराब की बिक्री और खपत भी कम हो गई है। इससे चीनी मिलों को डिस्टिलरी से शराब, अल्कोहल आदि बेचकर मिलने वाली राशि भी कम हो गई है।

5. चीनी मिलें गन्ने के सह-उत्पादों से बिजली बनाकर बेच देती थीं। परन्तु बिजली की खपत और मांग भी काफी घट गई है। कोल्हू और खाण्डसारी उद्योग में भी गन्ने की ज्यादा खपत नहीं हो सकती। चीनी मिलें शीरा, खोई (बगास), प्रैसमड़, बायो-फर्टीलाइजर, प्लाईवुड व अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं। परन्तु अब इन सब उत्पादों की मांग भी कम ही रहेगी जिससे गन्ने की मांग काफी कम हो जाएगी।

6. इन परिस्थितियों में अगले पेराई सत्र में चीनी मिलें ज्यादा गन्ना लेने में हाथ खड़े कर सकती हैं। अप्रैल अंत में उत्तर प्रदेश में गन्ने का बकाया लगभग 16,000 करोड़ रुपये हो गया है। 15-20% गन्ना खेतों में खड़ा है, परन्तु मिलें पर्चियां देने में आनाकानी कर रही हैं। अगले सत्र में यह परिस्थिति बहुत गंभीर हो सकती है।

7. अतः इस साल गन्ना किसानों को गन्ने का रकबा कम करके खरीफ की अन्य फसलों- दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और धान का रकबा बढ़ा देना चाहिए। अन्यथा आगामी पेराई सत्र में गन्ने को खेतों में ही नष्ट करने की नौबत आ सकती है।

चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह (लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष है)

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